ब्राह्मण ने कहा : हे राजन् , मैंने अपनी बुद्धि से अनेक गुरुओं का आश्रय लिया है। उनके द्वारा परलौकिक ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् अब मैं मुक्त अवस्था में पृथ्वी पर भ्रमण करता हूं। कृपया सुनें कि मैं उनका वर्णन आपसे किस प्रकार करता हूं।
The Brahmin said: O King, with my wisdom I have taken refuge in many Gurus. After acquiring divine knowledge from them, I now roam the earth in a liberated state. Please listen to me as I describe it to you.
तात्पर्य
इस श्लोक के बौद्धोपश्रिताः शब्द संकेत देते हैं कि ब्राह्मण के आध्यात्मिक गुरुओं ने सीधे उससे बातचीत नहीं की। इसके बजाय, उसने उनकी बुद्धिमानी से सीखा। वे सभी जीव जो भगवान कृष्ण के शत्रु हैं वे बेकार की भौतिक चीजों का महिमामंडन करते हैं और अपना जीवन भौतिक चीजों पर शासन करने में बिताते हैं जिसकी वे झूठी तरीके से पूजा करते हैं। इस प्रकार बंधी हुई आत्माएँ बाणभित्ती धार्मिकता, आर्थिक विकास और स्थूल इंद्रियों की संतुष्टि के द्वारा अपने जीवन की अवधि बढ़ाने के साथ-साथ अपनी प्रसिद्धि और सुंदरता को बढ़ाने की कोशिश करती हैं। राजा यदु ने देखा कि संत अवधूत ने ऐसा व्यवहार नहीं किया। इसीलिए राजा ब्राह्मण की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए उत्सुक था। राजा के प्रत्युत्तर में संत ब्राह्मण कहता है, "मैं भौतिक विश्व के चौबीस तत्वों को अपनी इंद्रियों की संतुष्टि की वस्तु नहीं मानता, और इसलिए मैं न तो उन्हें स्वीकार करता हूँ न ही अस्वीकार। इसके बजाय, मैं भौतिक तत्वों को अपने निर्देश देने वाले आध्यात्मिक गुरुओं के तौर पर स्वीकार करता हूँ। इस प्रकार, भौतिक विश्व में घूमने के बावजूद भी मैं गुरु की सेवा से कभी भी वंचित नहीं हुआ हूँ। स्थिर बुद्धि का आश्रय लेते हुए, मैं इस पृथ्वी पर निरंतर भ्रमण करता हूँ और लगातार पारलौकिक धरातल पर लगा रहता हूँ। मैं बुद्धि से बेकार की इच्छाओं का अतिक्रम करता हूँ, और मेरा अंतिम लक्ष्य भगवान की प्रेमपूर्ण भक्ति सेवा है। अब मैं आपको अपने चौबीस आध्यात्मिक गुरुओं के बारे में बताता हूँ।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥