श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  11.7.30 
त्वं हि न: पृच्छतां ब्रह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम् ।
ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवत: केवलात्मन: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण, हम देख रहे हैं कि आप भौतिक सुखों से दूर हैं और अकेले ही यात्रा कर रहे हैं, आपके साथ कोई साथी या परिवार का सदस्य नहीं है। इसलिए, हम आपसे विनम्रतापूर्वक पूछ रहे हैं, कृपया हमें बताएं कि आप अपने भीतर इतना आनंद कैसे महसूस कर रहे हैं।
 
O Brahmin, we see that you are free from any touch of material enjoyment and are wandering alone without any companion or family member. Since we are sincerely asking you, kindly tell us the reason for the great bliss you are experiencing within you.
तात्पर्य
केवलतात्मनः यह शब्द यहाँ महत्वपूर्ण है। जब तक मनुष्य सर्वोच्च आत्मा और व्यक्तिगत आत्मा, जो हर जीवित प्राणी के हृदय में एक साथ रहते हैं, का व्यावहारिक एहसास नहीं कर लेता, कृत्रिम रूप से संन्यास के स्तर को अपनाना और पत्नी, बच्चों या अन्य परिवार के सदस्यों के सहयोग के बिना यात्रा करना बहुत मुश्किल है। हर जीवित प्राणी का स्वभाव दूसरों से दोस्ती करना और किसी उपयुक्त व्यक्ति को अपना प्यार देना है। जिसने सर्वोच्च व्यक्ति को महसूस कर लिया है वह कृष्ण को सर्वव्यापी रूप में अपने दिल में हमेशा अपने साथी के रूप में रखने के लिए संतुष्ट है। जब तक यह एहसास नहीं हो जाता कि कृष्ण ही एकमात्र सच्चे मित्र है और कृष्ण हृदय में है, तब तक व्यक्ति भौतिक दुनिया के अस्थायी संबंधों से लगा रहेगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)