श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  11.7.3 
कुलं वै शापनिर्दग्धं नङ्‍क्ष्यत्यन्योन्यविग्रहात् ।
समुद्र: सप्तमे ह्येनां पुरीं च प्लावयिष्यति ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
अब ब्राह्मणों के शाप से ये यदुवंश निश्चित ही आपस में झगड़ कर समाप्त हो जाएगा और आज से सातवें दिन ये समुद्र उमड़कर इस द्वारका नगरी को डुबो देगा।
 
Now, due to the curse of the Brahmins, this Yadu dynasty will definitely be destroyed by fighting among themselves, and on the seventh day from today, this sea will overflow and flood this city of Dwarka.
तात्पर्य
इसके और आने वाले श्लोकों में, भगवान कृष्ण उद्धव को संकेत देते हैं कि उन्हें तुरंत भौतिक संसार के साथ अपने सभी पहचानों को छोड़ कर आत्म-साक्षात्कार में खुद को स्थिर कर लेना चाहिए। श्रील जीव गोस्वामी ने बताया है कि यदु वंश को वास्तव में भगवान कृष्ण ने नहीं नष्ट किया था बल्कि ब्राह्मणों के श्राप से दुनिया से केवल हटा दिया गया था; इसी तरह, भगवान का शाश्वत निवास द्वारका कभी भी सागर में डूब नहीं सकता। फिर भी, इस पारलौकिक शहर के सभी बाहरी दृष्टिकोण समुद्र से आच्छादित थे, और इस तरह भगवान का निवास कलियुग में मूर्ख व्यक्तियों के लिए दुर्गम है, जैसा कि आगे इस कांटो में वर्णित किया जाएगा।

भगवान की रहस्यमय शक्ति, जिसे योग-माया कहा जाता है, वह अपने स्वयं के रूप, आवास, उपकरण, मनोरंजन, दल, आदि प्रकट करते हैं, और उपयुक्त समय पर वह हमारी सांसारिक दृष्टि से इन सभी को हटा देते हैं। भले ही हैरान रहने वाली शर्तों वाली आत्माएँ भगवान की आध्यात्मिक शक्ति पर संदेह कर सकते हैं, शुद्ध भक्त सीधे तौर पर उनके पारलौकिक स्वरूप को समझ सकते हैं और उसका आनंद उठा सकते हैं और उनके गायब होने, जिन्हें भगवद-गीता में जनम कर्म चा मे दिव्यम के रूप में वर्णित किया गया है। यदि कोई भगवान के पारलौकिक स्वरूप के इस पूर्ण ज्ञान को ईमानदारी से स्वीकार करता है, तो निश्चित रूप से वह वापस घर, भगवान की ओर जाएगा, और भगवान कृष्ण का एक शाश्वत साथी बन जाएगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)