श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  11.7.29 
जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्निना ।
न तप्यसेऽग्निना मुक्तो गङ्गाम्भ:स्थ इव द्विप: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि भौतिक जगत के सभी लोग काम और लोभ की आग में जल रहे हैं, किंतु आप स्वतंत्र हैं और उस आग से नहीं जलते। आप उस हाथी की तरह हैं जो जंगल की आग से बचने के लिए गंगा नदी के जल में खड़ा होकर आश्रय ले रहा है।
 
Although all people in the material world are burning in the fire of desire and greed, you remain independent and are not burnt by that fire. You are like an elephant that has taken shelter in the waters of the Ganges River to escape the fire.
तात्पर्य
इस श्लोक में दिव्य आनंद का प्राकृतिक परिणाम बताया गया है। युवा ब्राह्मण शारीरिक रूप से बहुत ही आकर्षक था, और उसकी इंद्रियाँ भौतिक भोग के लिए शक्ति से भरपूर थीं, पर फिर भी वह भौतिक कामना से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं था। यह स्थिति मुक्ति कहलाती है।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि गंगा के भीतर पानी की बड़ी धाराएँ बहती हैं, जो धधकती आग को बुझाने में सक्षम हैं। अगर कामवासना से पागल हुआ हाथी गंगा के भीतर खड़ा हो जाए, तो इसकी शक्तिशाली, ठंडी धाराएँ उसकी वासना को बुझा देती हैं और हाथी शांत हो जाता है। इसी प्रकार, जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसे साधारण मनुष्य लालच और वासना के दुश्मनों द्वारा लगातार परेशान रहते हैं, जो मन को कभी भी पूरी तरह शांत नहीं होने देते। पर अगर, हाथी के उदाहरण का अनुसरण करते हुए कोई अपने आपको दिव्य आनंद की ठंडी धाराओं में स्थित कर ले, तो सारी भौतिक इच्छाएँ शीघ्र ही बुझ जाएँगी और वह शांत हो जाएगा। जैसा कि श्री चैतन्य चरितामृत में बताया गया है, कृष्ण भक्त निष्काम, अतएव शांत। इस प्रकार, सभी को चैतन्य महाप्रभु के आंदोलन को अपनाना चाहिए और कृष्ण चेतना के ठंडे जल में स्वयं को धोना चाहिए, जो हमारी वास्तविक, शाश्वत चेतना है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)