श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि गंगा के भीतर पानी की बड़ी धाराएँ बहती हैं, जो धधकती आग को बुझाने में सक्षम हैं। अगर कामवासना से पागल हुआ हाथी गंगा के भीतर खड़ा हो जाए, तो इसकी शक्तिशाली, ठंडी धाराएँ उसकी वासना को बुझा देती हैं और हाथी शांत हो जाता है। इसी प्रकार, जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसे साधारण मनुष्य लालच और वासना के दुश्मनों द्वारा लगातार परेशान रहते हैं, जो मन को कभी भी पूरी तरह शांत नहीं होने देते। पर अगर, हाथी के उदाहरण का अनुसरण करते हुए कोई अपने आपको दिव्य आनंद की ठंडी धाराओं में स्थित कर ले, तो सारी भौतिक इच्छाएँ शीघ्र ही बुझ जाएँगी और वह शांत हो जाएगा। जैसा कि श्री चैतन्य चरितामृत में बताया गया है, कृष्ण भक्त निष्काम, अतएव शांत। इस प्रकार, सभी को चैतन्य महाप्रभु के आंदोलन को अपनाना चाहिए और कृष्ण चेतना के ठंडे जल में स्वयं को धोना चाहिए, जो हमारी वास्तविक, शाश्वत चेतना है।
