श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  11.7.28 
त्वं तु कल्प: कविर्दक्ष: सुभगोऽमृतभाषण: ।
न कर्ता नेहसे किञ्चिज्जडोन्मत्तपिशाचवत् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
फिर भी, आप समर्थ, विद्वान, दक्ष, सुंदर और काफी वाचाल होने के बाद भी किसी काम में नहीं लगे हैं, न ही आप किसी चीज़ की इच्छा करते हैं, बल्कि एक पिशाच की तरह जड़वत और उन्मत्त लगते हैं।
 
However, despite being capable, learned, skilled, handsome and a clear speaker, you are neither engaged in doing any work nor do you desire anything; rather, you appear to be inert and mad, as if you were a demon.
तात्पर्य
अज्ञानी व्यक्ति अक्सर सोचते हैं कि त्यागमय आध्यात्मिक जीवन उन लोगों के लिए है जो नपुंसक होते हैं या घरेलू होते हैं या व्यावहारिक सांसारिक मामलों में अक्षम होते हैं। कभी-कभी मूर्ख लोग कहते हैं कि धार्मिक जीवन उन लोगों के लिए एक सहारा है जो समाज में एक उच्च स्थिति प्राप्त करने के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ नहीं हैं। इसलिए राजा यदु ने भिक्षुक ब्राह्मण के गुणों का वर्णन किया है ताकि यह दिखाया जा सके कि ब्राह्मण ने सांसारिक सफलता की महान क्षमता के बावजूद त्यागमय आध्यात्मिक जीवन लिया है। अवधूत ब्रह्मण को एक विशेषज्ञ, विद्वान, सुंदर दिखने वाला, वाक्पटु और हर मायने में एक महान भौतिक सफलता के रूप में वर्णित किया गया है। फिर भी, अवधूत ने भौतिक जीवन का त्याग किया है और कृष्ण चेतना को अपनाया है। परमानंद और ज्ञान के एक असीम जीवन के लिए घर वापस जाना, वापस भगवान के पास जाना, एक इंसान का असली काम है। भगवान चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी एक साथ अपनी कृष्ण चेतना का पालन करते हैं और दूसरों को कृष्ण चेतना को हासिल करने में मदद करने के लिए मिशनरी के काम में कठोर प्रयास करते हैं। अक्सर मूर्ख व्यक्ति भक्तों का यह कहकर उपहास करते हैं, "आपको नौकरी क्यों नहीं मिल जाती?" वे सोचते हैं कि जो व्यक्ति आध्यात्मिक ज्ञान के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रहा है और जो दूसरों को भी प्रबुद्ध कर रहा है, वह कुछ भी व्यावहारिक नहीं कर रहा है। मूर्ख भौतिकवादी एक अस्पताल में कुछ हफ्तों या महीनों तक अपने जीवन को बढ़ाने के लिए लाखों डॉलर का भुगतान करेंगे, लेकिन वे किसी को शाश्वत जीवन के लिए प्रयास करते हुए सराहना नहीं करते हैं। भौतिक जीवन में कोई वास्तविक तर्क नहीं है। कृष्ण के बिना आनंद उठाने की कोशिश करना अपने आप में तर्कहीनता की परिणति है, और इस प्रकार हम कृष्ण चेतना से रहित भौतिकवादी जीवन में अंततः तर्कसंगत या तार्किक कुछ भी खोजने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। कृष्ण के कई भक्त धनी, विद्वान और प्रभावशाली परिवारों से आते हैं, और वे अपने जीवन को पूर्ण करने के लिए कृष्ण चेतना को अपनाते हैं, और निश्चित रूप से भौतिक उन्नति के अवसर की कमी के कारण नहीं। यद्यपि कभी-कभी भौतिक संकट में फंसे व्यक्ति भौतिक जीवन में मदद के लिए सर्वोच्च भगवान के पास जाते हैं, लेकिन भगवान कृष्ण का एक वास्तविक भक्त स्वेच्छा से सभी प्रकार के भौतिक आनंद को त्याग देता है, यह जानते हुए कि कृष्ण के प्रेम और उनके चरण कमलों की सेवा के अलावा कुछ भी नहीं है। जीवन की वास्तविक पूर्णता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)