श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  11.7.23 
अत्र मां मृगयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरीश्वरम् ।
गृह्यमाणैर्गुणैर्लिङ्गैरग्राह्यमनुमानत: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं परमेश्वर कभी भी सामान्य इंद्रियबोध से नहीं पकड़ा जा सकता, फिर भी जो मनुष्य जीवन में हैं, वे अपनी बुद्धि और अन्य ज्ञानेंद्रियों का उपयोग मेरे प्रत्यक्ष और परोक्ष लक्षणों के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से खोज में लगा सकते हैं।
 
Although Me, the Supreme Personality of Godhead, can never be apprehended by ordinary sense perception, those who have attained human life can use their intelligence and other senses to directly search for Me through definite signs, direct and indirect.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, इस श्लोक में युक्ताः शब्द उन लोगों को इंगित करता है जो भक्ति-योग के नियमित अभ्यास में लिप्त हैं। प्रभु के भक्त अपनी बुद्धि को त्यागकर मूर्ख कट्टरपंथी नहीं बनते, जैसा कि कुछ मूर्ख सोचते हैं। अनुमानात और गुणैर्लिंगैः शब्दों द्वारा दर्शाए अनुसार, भक्ति-योग में लगे एक भक्त मानव मस्तिष्क की सभी तार्किक शक्तियों के माध्यम से ईश्वर व्यक्तित्व की गहन खोज करता है। हालांकि, मृगयंती, या "खोज" शब्द एक अनियंत्रित या अनधिकृत प्रक्रिया को इंगित नहीं करता है। यदि हम किसी विशेष व्यक्ति का टेलीफोन नंबर खोज रहे हैं, तो हम अधिकृत टेलीफोन निर्देशिका में देखते हैं। इसी तरह, यदि हम किसी विशेष उत्पाद की तलाश कर रहे हैं, तो हम एक विशेष स्टोर पर जाते हैं जहाँ हमें वह मिलने की संभावना है जिसकी हम तलाश कर रहे हैं। श्रील जीव गोस्वामी बताते हैं कि परम भगवान ईश्वर कल्पना की उपज नहीं है, और इसलिए हम सनकी ढंग से यह कल्पना नहीं कर सकते कि प्रभु क्या हो सकते हैं। इसलिए, भगवान कृष्ण के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए, किसी को अधिकृत वैदिक शास्त्रों में एक नियमित खोज करनी होगी। इस श्लोक में अग्राह्यम् शब्द इंगित करता है कि कोई भी साधारण अटकल या भौतिक इंद्रियों की गतिविधियों के माध्यम से भगवान कृष्ण को प्राप्त या समझ नहीं सकता है। इस संबंध में श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.234) में निम्नलिखित श्लोक कहा है:

अतः श्री-कृष्ण-नामादि

न भवेद् ग्राह्यम इंद्रियैः

सेवोनमुखे हि जिह्वादौ

स्वयं एव स्फुरत्य अदः

"कोई भी अपने भौतिक रूप से दूषित इंद्रियों के माध्यम से श्री कृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की पारलौकिक प्रकृति को नहीं समझ सकता है। केवल तभी जब कोई प्रभु के प्रति अपनी पारलौकिक सेवा से आध्यात्मिक रूप से तृप्त हो जाता है तो प्रभु के पारलौकिक नाम, रूप, गुण और लीलाएँ उन्हें प्रकट की जाती हैं।”

गृह्यमाणैर्गुणैः शब्द मनुष्य के मस्तिष्क की तार्किक और बौद्धिक शक्तियों को दर्शाते हैं। इन सभी का उपयोग सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से भगवान के व्यक्तित्व को समझने के लिए किया जा सकता है। अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति प्रभु को उनकी रचना के माध्यम से अनुभव कर सकता है। चूंकि हम अपनी बुद्धि (और इंद्रियों) के माध्यम से इस दुनिया का अनुभव कर रहे हैं, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमारी अपनी बुद्धि का एक निर्माता होना चाहिए और वह निर्माता इसलिए सर्वोच्च रूप से बुद्धिमान है। इस प्रकार, सरल तर्क द्वारा कोई भी समझदार व्यक्ति यह समझ सकता है कि एक सर्वोच्च ईश्वरत्व है जो हर चीज को नियंत्रित करता है।

व्यक्ति प्रभु को उनके पवित्र नामों और महिमा का जप और श्रवण करके भी सीधे अनुभव कर सकता है। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः का अर्थ है कि व्यक्ति को हमेशा प्रभु की महिमा का जप और श्रवण करना चाहिए। जो पूर्ण रूप से सुनता और जप करता है वह निस्संदेह प्रभु को आमने-सामने देखेगा। भगवान कृष्ण सर्वव्यापी हैं और व्यक्ति को हर जगह उनकी खोज करनी चाहिए। भक्ति-योग द्वारा शुद्ध की गई दिव्य इंद्रियों द्वारा, व्यक्ति सीधे ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझ सकता है। जैसा कि इस श्लोक में अद्धा शब्द द्वारा दर्शाया गया है, यह बोध प्रत्यक्ष है और काल्पनिक नहीं है। इस बिंदु को श्रील प्रभुपाद ने श्रीमद्-भागवतम (2.2.35) से इस श्लोक के अपने सार में विस्तार से समझाया है:

भगवान सर्व-भूतेषु

लक्षित स्वात्मान हरिः

दृश्यैर्बुद्धय-आदिभिर्द्रष्टा

लक्षणैरनुमापकैः

"भगवान, श्री कृष्ण जी प्रत्येक जीवित प्राणी में व्यक्तिगत आत्मा के साथ हैं, और इस तथ्य को देखने और बुद्धि से सहायता लेने के हमारे कृत्यों में माना और अनुमान लगाया गया है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)