अतः श्री-कृष्ण-नामादि
न भवेद् ग्राह्यम इंद्रियैः
सेवोनमुखे हि जिह्वादौ
स्वयं एव स्फुरत्य अदः
"कोई भी अपने भौतिक रूप से दूषित इंद्रियों के माध्यम से श्री कृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की पारलौकिक प्रकृति को नहीं समझ सकता है। केवल तभी जब कोई प्रभु के प्रति अपनी पारलौकिक सेवा से आध्यात्मिक रूप से तृप्त हो जाता है तो प्रभु के पारलौकिक नाम, रूप, गुण और लीलाएँ उन्हें प्रकट की जाती हैं।”
गृह्यमाणैर्गुणैः शब्द मनुष्य के मस्तिष्क की तार्किक और बौद्धिक शक्तियों को दर्शाते हैं। इन सभी का उपयोग सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से भगवान के व्यक्तित्व को समझने के लिए किया जा सकता है। अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति प्रभु को उनकी रचना के माध्यम से अनुभव कर सकता है। चूंकि हम अपनी बुद्धि (और इंद्रियों) के माध्यम से इस दुनिया का अनुभव कर रहे हैं, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमारी अपनी बुद्धि का एक निर्माता होना चाहिए और वह निर्माता इसलिए सर्वोच्च रूप से बुद्धिमान है। इस प्रकार, सरल तर्क द्वारा कोई भी समझदार व्यक्ति यह समझ सकता है कि एक सर्वोच्च ईश्वरत्व है जो हर चीज को नियंत्रित करता है।
व्यक्ति प्रभु को उनके पवित्र नामों और महिमा का जप और श्रवण करके भी सीधे अनुभव कर सकता है। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः का अर्थ है कि व्यक्ति को हमेशा प्रभु की महिमा का जप और श्रवण करना चाहिए। जो पूर्ण रूप से सुनता और जप करता है वह निस्संदेह प्रभु को आमने-सामने देखेगा। भगवान कृष्ण सर्वव्यापी हैं और व्यक्ति को हर जगह उनकी खोज करनी चाहिए। भक्ति-योग द्वारा शुद्ध की गई दिव्य इंद्रियों द्वारा, व्यक्ति सीधे ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझ सकता है। जैसा कि इस श्लोक में अद्धा शब्द द्वारा दर्शाया गया है, यह बोध प्रत्यक्ष है और काल्पनिक नहीं है। इस बिंदु को श्रील प्रभुपाद ने श्रीमद्-भागवतम (2.2.35) से इस श्लोक के अपने सार में विस्तार से समझाया है:
भगवान सर्व-भूतेषु
लक्षित स्वात्मान हरिः
दृश्यैर्बुद्धय-आदिभिर्द्रष्टा
लक्षणैरनुमापकैः
"भगवान, श्री कृष्ण जी प्रत्येक जीवित प्राणी में व्यक्तिगत आत्मा के साथ हैं, और इस तथ्य को देखने और बुद्धि से सहायता लेने के हमारे कृत्यों में माना और अनुमान लगाया गया है।"
