श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  11.7.21 
पुरुषत्वे च मां धीरा: साङ्ख्ययोगविशारदा: ।
आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
सांख्य योग में निपुण और आत्म-नियंत्रित मनुष्य मुझे मेरी सभी शक्तियों के साथ प्रत्यक्ष देख सकते हैं।
 
In human life, those who are self-controlled and adept in Sankhya Yoga can see me directly with all my powers.
तात्पर्य
इस प्रकार के कथन वेदों में मिलते हैं: पुरूषत्वे चाविष्टारम आत्मा सहित-प्रज्ञानेन सम्पन्न तमो विज्ञातं वदति विज्ञातं पश्यति वेद श्वासनं वेद लोकालोकौ मृत्येना मृतं ईप्सत्येवं सम्पन्नः एथारेषां पशूनाम आसन-पिपासे एवाभिज्ञानम्। "मानव जीवन के रूप में, आत्मा आध्यात्मिक ज्ञान को समझने के लिए खुफिया जानकारी से पूरी तरह से संपन्न है। इस प्रकार, मानव जीवन में आत्मा साकार ज्ञान बोल सकता है, सत्य देख सकता है, भविष्य को जान सकता है और इस दुनिया और अगले दोनों की वास्तविकता को भी समझ सकता है। नश्वर जीवन के अनुभव का लाभ उठाते हुए, मानव रूप में आत्मा अमरता के लिए प्रयास कर सकता है, और मानव शरीर इस अंत को प्राप्त करने के लिए पूरी तरह से सुसज्जित है। इस तरह की एक ऊंची अवस्था में आत्मा निश्चित ही जानवरों की सामान्य गतिविधियों, जैसे कि खाने और पीने से अच्छी तरह से परिचित है।"

मानव जीवन का रूप (पुरुषतवे) बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें अपने अस्तित्व को पूर्ण करने का अवसर प्रदान करता है। यहाँ उल्लिखित सांख्य प्रणाली का सबसे अच्छा वर्णन भगवान कपिल द्वारा उनकी माँ, देवहूति को दिए गए निर्देशों से किया गया है। भगवान कपिल भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, और उनकी माँ ने उनसे संपर्क किया, यह कहते हुए:

निर्विण्णा निरंतरं भूमान

असद-इंद्रिय-तर्षणात

येन संभाव्य माननं

प्रपन्न अंधं तमः प्रभो

"मैं अपनी भौतिक इंद्रियों के कारण होने वाली गड़बड़ी से बहुत बीमार हूं, क्योंकि इस इंद्रिय गड़बड़ी के कारण, मेरे भगवान, मैं अज्ञानता की खाई में गिर गई हूँ।" (भाग। 3.25.7) भगवान कपिल ने अपनी माँ को सभी भौतिक और आध्यात्मिक वास्तविकता का एक अत्यधिक विश्लेषणात्मक सारांश दिया। यह महत्वपूर्ण है कि भगवान कपिल ने अपनी माँ के साथ भेदभाव नहीं किया क्योंकि वह एक महिला थी, और न ही उन्होंने उसे सबसे विस्तृत आध्यात्मिक ज्ञान को समझने में असमर्थ माना। इस प्रकार, मुक्त आत्माओं के कृष्ण चैतन्य समाज में, कोई भी पुरुष, महिला या बच्चा बिना किसी भेदभाव के भगवान कृष्ण का एक महान भक्त बन सकता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि भगवान कपिल द्वारा प्रतिपादित अत्यधिक बौद्धिक सांख्य प्रणाली में, ठोस निष्कर्ष शुद्ध भक्तों के चरण कमलों के लिए समर्पण और भगवान का प्रेम है। श्रीमद-भागवतम के तीसरे कैंटो में भगवान कपिल के निर्देशों में, उन्होंने भगवान के शुद्ध भक्तों का आश्रय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया। वर्तमान कविता में भगवान कृष्ण कहते हैं, सांख्य-योग-विशारदाह: जो लोग शुद्ध भक्तों का आश्रय लेने में विशेषज्ञ हैं और इस प्रकार इस दुनिया की वास्तविक स्थिति को समझ सकते हैं, वे कृष्ण को उनकी व्यक्तिगत शक्ति के साथ-साथ उनकी आंतरिक और बाहरी शक्तियों के साथ उनके व्यक्तिगत रूप में देखने में सक्षम हैं।

एक आध्यात्मिक गुरु अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण से बोना फ़ाइड हो जाता है; लेकिन जैसा कि इस अध्याय में बताया गया है, कोई भी अपने स्वयं के गुरु के रूप में भी कार्य कर सकता है। इसका मतलब यह है कि एक बुद्धिमान और अवधारणात्मक व्यक्ति इस दुनिया की प्रकृति और अपनी खुद की सीमाओं को समझ सकता है। ऐसा व्यक्ति तब भगवान के शुद्ध भक्तों से जुड़ने और कृष्ण चैतन्य में उन्नत लोगों की दया प्राप्त करने के लिए बहुत इच्छुक हो जाता है। श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, सांख्य-योग, जैसा कि यहां वर्णित है, भक्ति-योग की भक्ति के साथ-साथ ज्ञान-योग प्रणाली की कठोर बौद्धिक प्रगति को संदर्भित करता है, जो शुद्ध भक्तों के कमल चरणों की दया पर जोर देता है।

वास्तव में, ज्ञान-योग भक्ति-योग प्रणाली में एक कारक है, क्योंकि कृष्ण ज्ञान-गाम्य हैं, या सभी ज्ञान का लक्ष्य हैं। भगवद्-गीता (१०.१०) में भगवान ने यह भी कहा है कि वह व्यक्तिगत रूप से एक निष्ठावान भक्त को सभी ज्ञान से रोशन करते हैं। इस अध्याय में, भगवान कृष्ण भौतिक दुनिया में अपने दैनिक अनुभवों के दौरान भगवान के व्यक्तिगत रूप को देखने के लिए उद्धव को प्रशिक्षित कर रहे हैं। भगवान ने पहले ही उद्धव को संकेत दिया है कि वह समाधि, या ट्रान्स में दुनिया भर में यात्रा करेगा, और अब भगवान कृष्ण उद्धव को एक सच्चे संन्यासी के रूप में यात्रा करने के लिए तैयार कर रहे हैं, जो भगवान के व्यक्तित्व को हर जगह देख रहा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)