श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  11.7.20 
आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषत: ।
यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान व्यक्ति, जो अपने आसपास की दुनिया को समझने और तर्क-वितर्क करने में माहिर होता है, अपनी बुद्धि से ही असली फायदा हासिल कर सकता है। इस तरह कभी-कभी व्यक्ति खुद ही अपना गुरु और शिक्षक बन जाता है।
 
An intelligent person, who is adept at perceiving the world around him and using sound reasoning, can derive real benefit from his own intelligence. Thus sometimes a man becomes his own preacher and guru.
तात्पर्य
जैसे कि इस अध्याय में राजा यदु और अवधूत के बीच हुई बातचीत से स्पष्ट होता है, एक संवेदनशील, समझदार व्यक्ति अपने आसपास की दुनिया को ध्यान से देखकर ही वास्तविक ज्ञान और सुख प्राप्त कर सकता है। अन्य जीवित प्राणियों के सुख और दुख को देखकर, व्यक्ति समझ सकता है कि क्या लाभकारी है और क्या विनाशकारी।

श्रील जीव गोस्वामी इस संबंध में कहते हैं, गुरु-अनुसरण प्रवर्तक इति अरथः: स्वयं की धारणा और बुद्धि द्वारा प्राप्त ज्ञान व्यक्ति को भगवान कृष्ण के प्रतिनिधि के मूल्य की सराहना करने की ओर ले जाता है। इस श्लोक में श्रेयस शब्द इंगित करता है कि व्यक्ति अपनी बुद्धि से जीवन में प्रगति कर सकता है। अच्छे संग के द्वारा व्यक्ति को धीरे-धीरे कृष्ण के सेवक के रूप में अपने शाश्वत स्थान को समझना चाहिए, और फिर वह अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों की संगति में रहने के लिए बहुत उत्सुक हो जाता है। एक ही विचार के पक्षी एक साथ झुंड बनाते हैं। कृष्ण के एक प्रबुद्ध सेवक का लक्षण यह है कि वह ऐसी अन्य महान आत्माओं की संगति के लिए उत्सुक है। इस प्रकार, इस भौतिक संसार के अपने संवेदनशील और तर्कसंगत अवलोकन द्वारा, व्यक्ति को भक्तों की संगति में आध्यात्मिक जीवन के मूल्य की सराहना करनी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)