श्रील जीव गोस्वामी इस संबंध में कहते हैं, गुरु-अनुसरण प्रवर्तक इति अरथः: स्वयं की धारणा और बुद्धि द्वारा प्राप्त ज्ञान व्यक्ति को भगवान कृष्ण के प्रतिनिधि के मूल्य की सराहना करने की ओर ले जाता है। इस श्लोक में श्रेयस शब्द इंगित करता है कि व्यक्ति अपनी बुद्धि से जीवन में प्रगति कर सकता है। अच्छे संग के द्वारा व्यक्ति को धीरे-धीरे कृष्ण के सेवक के रूप में अपने शाश्वत स्थान को समझना चाहिए, और फिर वह अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों की संगति में रहने के लिए बहुत उत्सुक हो जाता है। एक ही विचार के पक्षी एक साथ झुंड बनाते हैं। कृष्ण के एक प्रबुद्ध सेवक का लक्षण यह है कि वह ऐसी अन्य महान आत्माओं की संगति के लिए उत्सुक है। इस प्रकार, इस भौतिक संसार के अपने संवेदनशील और तर्कसंगत अवलोकन द्वारा, व्यक्ति को भक्तों की संगति में आध्यात्मिक जीवन के मूल्य की सराहना करनी चाहिए।
