श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  11.7.19 
श्रीभगवानुवाच
प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणा: ।
समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने उत्तर दिया : आम तौर पर वे इंसान, जो भौतिक दुनिया की असल स्थिति का निपुणता से विश्लेषण कर सकते हैं, अपने आपको स्थूल भौतिक संतुष्टि के अशुभ जीवन से ऊपर उठाने में सक्षम होते हैं।
 
The Lord replied: Generally speaking, those human beings who can skillfully analyze the true state of the material universe are able to elevate themselves from the ominous life of gross material satisfaction.
तात्पर्य
पिछले श्लोकों में श्री उद्धव ने भगवान से अपनी पतित अवस्था और भौतिक जीवन अवधारणा में उलझने को व्यक्त किया है। अब भगवान कृष्ण उद्धव को आश्वस्त करते हैं कि उद्धव से भी कम योग्य व्यक्ति भी भौतिक इंद्रियों की तृप्ति के अशुभ जीवन से खुद को छुड़ाने में सक्षम हैं। श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, भले ही किसी ने सच्चे आध्यात्मिक गुरु से उपदेश प्राप्त नहीं किया हो, फिर भी वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विश्लेषण द्वारा यह समझ सकता है कि भौतिक दुनिया सुख की जगह नहीं है। प्रत्यक्ष विश्लेषण का अर्थ है किसी का व्यक्तिगत अनुभव और अप्रत्यक्ष विश्लेषण का अर्थ है दूसरों के अनुभव को सुनना और पढ़ना।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, भगवान कृष्ण उद्धव को स्वर्ग के देवताओं से भी अधिक बुद्धिमान मानते थे। हालाँकि, उद्धव हतोत्साहित महसूस कर रहे थे, यह सोचकर कि वह भगवान को भक्ति सेवा देने के लिए अयोग्य हैं। लेकिन उद्धव वास्तव में पूरी तरह से स्थित थे क्योंकि उन्होंने भगवान कृष्ण को अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्राप्त किया था। इसी तरह, कृष्ण चेतना आंदोलन के सदस्य समाज के संस्थापक-आचार्य, ओं विष्णुपाद परमहंस परिव्राजाचार्य अष्टोत्तर-शत श्री श्रीमद एसी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के निर्देशों द्वारा निर्देशित होते हैं। इसलिए, कृष्ण चेतना आंदोलन के एक ईमानदार सदस्य को कभी भी हतोत्साहित नहीं होना चाहिए बल्कि अपनी आशीर्वादों को गिनना चाहिए और भगवान के पास वापस घर वापस जाने के लिए आवश्यक कार्य करना चाहिए। भौतिक दुनिया के भीतर, कुछ गतिविधियाँ शुभ हैं और सुख का उत्पादन करती हैं, जबकि अन्य गतिविधियाँ, पापपूर्ण होने के कारण, अशुभ हैं और असीमित दुख का कारण बनती हैं। यहाँ तक कि जिसने अभी तक सच्चे कृष्ण चेतन आध्यात्मिक गुरु की पूरी कृपा प्राप्त नहीं की है, उसे तीक्ष्ण बुद्धि से निष्कर्ष निकालना चाहिए कि साधारण, भौतिक जीवन में कोई खुशी नहीं है और वास्तविक स्वार्थ भौतिक मंच से परे है।

श्रील माधवाचार्य बताते हैं कि भले ही कोई न केवल भौतिक ज्ञान में बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान में भी विशेषज्ञ हो, फिर भी अगर वह भगवान के भक्तों के संग को नज़रअंदाज़ करता है तो वह अज्ञान के अंधकार में प्रवेश करेगा। इसलिए, किसी को भी इस श्लोक की गलत व्याख्या नहीं करनी चाहिए जिससे शुद्ध भक्त आध्यात्मिक गुरु के महत्व को कम आंका जा सके। जो विचक्षण है या विशेषज्ञ है, वह अंततः पदार्थ और आत्मा के बीच के अंतर को समझ जाएगा। ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु को पहचानेगा और उसकी सराहना करेगा। जो ज्ञान में उन्नत है वह निस्संदेह विनम्र हो जाता है, और इस प्रकार एक विशेषज्ञ उन्नत व्यक्ति भगवान के शुद्ध भक्तों के चरण कमलों की कभी उपेक्षा नहीं करेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)