श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  11.7.18 
तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं
सर्वज्ञमीश्वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम् ।
निर्विण्णधीरहमु हे वृजिनाभितप्तो
नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए, हे स्वामी, भौतिक जीवन से थककर और उसके कष्टों से त्रस्त होकर मैं आपकी शरण में आया हूँ, क्योंकि आप पूर्ण स्वामी हैं। आप अनंत, सर्वज्ञ भगवान हैं, जिनका आध्यात्मिक निवास वैकुण्ठ में है और सभी अशांति से मुक्त है। वास्तव में, आप सभी जीवों के मित्र नारायण के नाम से जाने जाते हैं।
 
Therefore, O Swami, bored with material life and tormented by its miseries, I surrender to You, for You are the perfect Lord. You are the infinite, omniscient Supreme Lord, whose spiritual abode in Vaikuntha is free from all disturbances. Indeed, You are known as Narayana, the friend of all living entities.
तात्पर्य
कोई भी यह दावा नहीं कर सकता है कि वह स्व-निर्मित है, क्योंकि हर कोई भौतिक प्रकृति द्वारा दिए गए शरीर और मन के साथ काम करता है। प्रकृति के नियमों के द्वारा भौतिक अस्तित्व में हमेशा चिंता रहती है और भयानक त्रासदियाँ सशर्त आत्माओं को समय-समय पर परेशान करती हैं। यहाँ उद्धव बताते हैं कि केवल भगवान श्री कृष्ण, भगवान का व्यक्तित्व, सशर्त आत्माओं के लिए एक उचित गुरु, मित्र और आश्रय हैं। हम एक विशेष मनुष्य या देवता के अच्छे गुणों से आकर्षित हो सकते हैं, लेकिन बाद में हम उस व्यक्ति के व्यवहार में विसंगतियों को पा सकते हैं। इसलिए कृष्ण को अनावद्यम बताया गया है। भगवान के व्यक्तित्व के व्यक्तिगत आचरण या चरित्र में कोई विसंगतियाँ नहीं हैं; वह शाश्वत रूप से दोषमुक्त हैं।

हम ईमानदारी से एक गुरु, पिता या देवता की सेवा कर सकते हैं, लेकिन जब हमारे वफादार सेवा के लिए हमारा इनाम प्राप्त करने का समय आता है, तो गुरु मर सकता है। इसलिए भगवान कृष्ण को यहाँ अनंत-पारम के रूप में वर्णित किया गया है, जो इंगित करता है कि वह समय या स्थान से सीमित नहीं हैं। शब्द अंत समय की समाप्ति को इंगित करता है और पार एक स्थानिक समाप्ति को इंगित करता है; इसलिए अनंत-पारम का अर्थ है कि भगवान कृष्ण समय या स्थान से सीमित नहीं हैं और इस प्रकार हमेशा अपने वफादार सेवकों को पुरस्कृत करेंगे।

यदि हम भगवान के व्यक्तित्व से इतर किसी की सेवा करते हैं, तो हमारे तथाकथित गुरु हमारी सेवा को भूल सकते हैं या कृतघ्न हो सकते हैं। इसलिए भगवान कृष्ण को यहाँ सर्व-ज्ञम, सर्वज्ञ के रूप में वर्णित किया गया है। वह अपने भक्त की सेवा को कभी नहीं भूल सकते हैं और इसलिए वह कभी कृतघ्न नहीं होते हैं। वास्तव में, यह कहा जाता है कि भगवान कृष्ण अपने भक्तों की गलतियों को नहीं याद करते हैं, बल्कि केवल उनके द्वारा प्रदान की गई ईमानदार सेवा को याद करते हैं।

कृष्ण के अलावा किसी और की सेवा करने में एक और नुकसान यह है कि जब हम खतरे में होते हैं तो हमारे गुरु हमारी रक्षा करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। यदि हम अपने राष्ट्र की शरण लेते हैं, तो उस राष्ट्र को युद्ध में नष्ट किया जा सकता है। यदि हम अपने परिवार की शरण लेते हैं, तो वे भी मर सकते हैं। और जैसा कि वैदिक साहित्य में वर्णित है, यहाँ तक कि देवता भी कभी-कभी राक्षसों द्वारा पराजित हो जाते हैं। लेकिन चूंकि भगवान कृष्ण को यहाँ ईश्वर या सर्वोच्च नियंत्रक के रूप में वर्णित किया गया है, इसलिए उनके पराजित होने या किसी अन्य शक्ति द्वारा बाधित होने का कोई खतरा नहीं है। इस प्रकार भगवान कृष्ण का अपने भक्त की रक्षा करने का वादा शाश्वत रूप से वैध है।

यदि हम भगवान के व्यक्तित्व की सेवा नहीं करेंगे, तो हमें अपनी सेवा का अंतिम परिणाम नहीं पता चलेगा। लेकिन यहाँ भगवान कृष्ण को अकुंठ-विकुंठ-धिष्ण्यम के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान कृष्ण के पास वैकुंठ नामक एक शाश्वत निवास है, और उस निवास को कभी भी किसी चीज से परेशान नहीं किया जाता है। भगवान कृष्ण के वफादार सेवक निश्चित रूप से भगवान के व्यक्तिगत निवास में आनंद और ज्ञान के शाश्वत जीवन के लिए भगवान के पास वापस जाएंगे। हालाँकि, चूंकि देवता भी और क्या कहना है कि तुच्छ मनुष्य हैं,遲 या बाद में विनाश के अधीन हैं, तो उनकी सेवा करने से क्या अंतिम लाभ हो सकता है?

उद्धव ने अपनी व्यक्तिगत स्थिति को निरविन्न-धीः और वृजिनाभिताप्तः के तौर पर वर्णित किया है। दूसरे शब्दों में, श्री उद्धव बताते हैं कि भौतिक जीवन के विरोधाभासों और पीड़ा से वह थक गए हैं और उनका साहस टूट चुका है। इसलिए उसे विनम्र होने और हर सजीव इकाई के निजी मित्र कृष्ण के चरण कमलों में आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। भौतिक दुनिया में एक प्रभावशाली व्यक्ति के पास मामूली लोगों के लिए समय नहीं होता है। लेकिन भगवान जहां संसार में सबसे महान व्यक्ति हैं, वे हर जीवित इकाई के हृदय में विराजमान हैं; इस प्रकार, वह सबसे दयालु हैं। भगवान कृष्ण नार, या भगवान के पुरुष विस्तार का भी सर्वोच्च आश्रय हैं, जो भौतिक दुनिया का निर्माण करते हैं। सजीव इकाई को नर कहा जाता है, और उसकी भौतिक स्थिति का स्रोत नार, या महा-विष्णु है। नारायण शब्द यह दर्शाता है कि महा-विष्णु भी कृष्ण में अपने शरण ढूंढते हैं, जो निश्चित रूप से सर्वोच्च हैं। हालाँकि वर्तमान में हमारी चेतना पापी प्रवृत्तियों से दूषित है, अगर हम श्री उद्धव के उदाहरण का पालन करते हैं और भगवान कृष्ण, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का आश्रय लेते हैं, तो सब कुछ ठीक हो सकता है। कृष्ण का आश्रय लेने का अर्थ है कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा लेना और उनका पालन करना। भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता में यह मांग की है, और अगर हम भगवान के आदेश का पालन करते हैं तो हमारा जीवन पूरी तरह से शुभ और सफल हो सकता है। हमारी अपेक्षा से जल्द ही, कृष्ण की दया से, हम आनंद और ज्ञान के अनंत जीवन के लिए ईश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)