श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  11.7.17 
सत्यस्य ते स्वद‍ृश आत्मन आत्मनोऽन्यं
वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे ।
सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे
ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावा: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आप परम सत्य भगवान् हैं और आप अपने भक्तों को अपना रूप दिखलाते हैं। आपकी महानता के अलावा, मुझे कोई ऐसा नहीं दिखता जो वास्तव में मुझे पूर्ण ज्ञान बता सके। ऐसा पूर्ण शिक्षक स्वर्ग में देवताओं के बीच भी नहीं मिलता। निश्चित रूप से, ब्रह्माजी इत्यादि सभी देवता आपकी मायाशक्ति से मोहित हैं और बद्ध जीव हैं, जो अपने भौतिक शरीरों और शारीरिक विस्तार को सर्वोच्च सत्य मान लेते हैं।
 
O Lord, You are the Supreme Truth, the Supreme Personality of Godhead, and You reveal Your form to Your devotees. I do not see anyone other than You who can really impart to me the perfect knowledge. Such a perfect teacher cannot be found even among the demigods in heaven. Indeed, all the demigods, including Brahma, are bewildered by Your illusory potency. They are conditioned souls who consider their material bodies and bodily parts to be the supreme truth.
तात्पर्य
सभी शर्तों से बंधी आत्माएँ, भगवान ब्रह्मा से लेकर तुच्छ चींटी तक, श्री उद्धव द्वारा भगवान की भ्रामक शक्ति द्वारा उत्पादित भौतिक शरीरों से आच्छादित घोषित की जाती हैं। स्वर्ग के देवता, सार्वभौमिक प्रबंधन में लीन होने के नाते, लगातार अपनी शानदार भौतिक शक्तियों का उपयोग करते हैं। इसलिए वे धीरे-धीरे अपने दिमाग को अपने रहस्यमय रूप से सशक्त शरीरों और अपने दिव्य पत्नियों, बच्चों, सहकर्मियों और दोस्तों जैसे शारीरिक विस्तारों पर टिकाते हैं। स्वर्गीय ग्रहों में जीवन के दौरान, देवता भौतिक अच्छे और बुरे के संदर्भ में सोचने के लिए वातानुकूलित हो जाते हैं, और इस प्रकार वे अपने शरीर के तत्काल कल्याण को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं।

हालाँकि, देवता ईश्वर के नियमों का सख्ती से पालन करने का प्रयास करते हैं। और ऐसा करने में उनकी मदद करने के लिए, परम भगवान स्वर्गीय प्राणियों को अपने स्वयं के सर्वोच्च व्यक्तित्व की याद दिलाने के लिए अवतरित होते हैं, जिसमें उनकी शक्तियाँ अनंत रूप से अधिक होती हैं। भगवान विष्णु का एक शाश्वत शरीर है, जो आनंद, ज्ञान और असीमित विविध शक्तियों से भरा है, जबकि देवताओं के पास केवल डीलक्स भौतिक रूप हैं, जो जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी के अधीन हैं।

क्योंकि देवता सृजित ब्रह्मांड पर शासन करने से जुड़े हुए हैं, ईश्वर के प्रति उनकी भक्ति भौतिक इच्छाओं से रंगी हुई है। इसलिए वे वैदिक ज्ञान के उन हिस्सों से आकर्षित होते हैं जो उनके खगोलीय जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक विभिन्न भौतिक भव्यता प्रदान करते हैं। हालाँकि, श्री उद्धव, भगवान के एक शुद्ध भक्त होने के नाते, वापस घर, वापस भगवान के पास, अनंत जीवन के लिए जाने के लिए दृढ़ हैं और इस प्रकार देवताओं के परिष्कृत वैदिक ज्ञान में बिल्कुल भी रुचि नहीं रखते हैं। भौतिक दुनिया एक विशाल जेल है, जिसके निवासी जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और भ्रम के अधीन हैं, और एक शुद्ध भक्त की इच्छा नहीं है कि वह देवताओं की तरह प्रथम श्रेणी के कैदी के रूप में भी वहाँ रहे। श्री उद्धव भगवान के राज्य में लौटना चाहते हैं और इस कारण से सीधे भगवान के व्यक्तित्व से संपर्क करते हैं। भगवान स्व-दृश्य हैं, या जो खुद को उनके भक्त के सामने प्रकट करते हैं। इस प्रकार, केवल स्वयं भगवान या उनके शुद्ध भक्त, जो ईमानदारी से भगवान के संदेश को दोहराते हैं, किसी को भौतिक आकाश से परे आध्यात्मिक ग्रहों के मुक्त वातावरण में ले जा सकते हैं, जहाँ मुक्त आत्माएँ आनंद और सर्वज्ञता के शाश्वत जीवन का आनंद लेती हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)