त्यागोऽयं दुष्करो भूमन् कामानां विषयात्मभि: ।
सुतरां त्वयि सर्वात्मन्नभक्तैरिति मे मति: ॥ १५ ॥
अनुवाद
हे प्रभु, हे परम आत्मा, जिन लोगों का मन इंद्रियतृप्ति में लगा रहता है, और खास तौर पर जो लोग आपकी भक्ति से वंचित हैं, उनके लिए भौतिक सुख-सुविधाओं को त्यागना बेहद मुश्किल है। मेरा यही मानना है।
O Lord, O Supreme Soul, it is very difficult for those whose minds are involved in sense-gratification, and especially for those who are deprived of Your devotional service, to give up material enjoyment. That is my opinion.
तात्पर्य
वे लोग जो वास्तव में सर्वोच्च प्रभु को समर्पित हैं, वे अपनी निजी संतुष्टि के लिए कुछ भी स्वीकार नहीं करते हैं बल्कि प्रभु की प्रेममयी सेवा में अर्पित करने के लिए उपयुक्त चीजों को स्वीकार करते हैं। विहायत्मभीः शब्द उन लोगों को इंगित करता है जो प्रभु की भक्ति सेवा के बजाय अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए भौतिक वस्तुओं की इच्छा रखते हैं। ऐसे भौतिकवादी व्यक्तियों का मन उपयुक्त रूप से अशांत होता है, और ऐसे व्यक्तियों के लिए भौतिक भोग को त्यागना लगभग असंभव है। यह श्री उद्धव का मत है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥