भौतिक दुनिया में हम झूठ से स्वयं को इंद्रियों की वस्तुओं के साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। मनुष्य नारी से और नारी मनुष्य से जुड़ना चाहता है, या कोई राष्ट्रवाद, समाजवाद, पूँजीवाद या भगवान की भ्रामक ऊर्जा की अनगिनत अन्य रचनाओं से जुड़ने की कोशिश करता है। चूँकि हम खुद को अस्थायी वस्तुओं से जोड़ रहे हैं, इसलिए रिश्ते भी अस्थायी हैं, परिणाम अस्थायी हैं, और मृत्यु के समय हम घबरा जाते हैं जब हमारे सभी संबंध माया से अचानक कट जाते हैं। यदि हम स्वयं को कृष्ण से जोड़ते हैं, तो मृत्यु के बाद भी उनके साथ हमारा रिश्ता बना रहेगा। जैसा कि भगवद् गीता में बताया गया है, कृष्ण के साथ रिश्ता जो हम इस जीवन में विकसित करते हैं, हमारे अगले जीवन में भी बढ़ना जारी रखेगा जब तक कि हम कृष्ण के ग्रह में प्रवेश करने के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते। जो भगवान द्वारा बताए गए दिव्य जीवन शैली का पालन करते हुए, चैतन्य महाप्रभु के मिशन की ईमानदारी से सेवा करते हैं, वे इस जीवन के अंत में भगवान के निवास में प्रवेश करेंगे।
मानसिक अटकल से कभी भी कोई स्थायी स्थिति प्राप्त नहीं की जा सकती है, और साधारण भौतिक इंद्रिय संतुष्टि क्या बोलती है। हठ-योग, कर्म-योग, राज-योग, ज्ञान-योग आदि के तरीकों से, कोई भी वास्तव में भगवान के व्यक्तित्व के लिए शाश्वत प्रेममय सेवा करने की अपनी प्रवृत्ति को नहीं जगाता है। इस प्रकार, कोई भी आध्यात्मिक आनंद के पारलौकिक स्वाद से वंचित रह जाता है। कभी-कभी, संतान आत्मा, अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने में अपनी विफलता से निराश होकर, भौतिक दुनिया को त्यागने और एक अवैयक्तिक, दर्द रहित पारलौकिकता में विलय करने का फैसला करती है। लेकिन हमारा वास्तविक सुखी स्थिति भगवान के व्यक्तित्व के चरणों में प्रेमपूर्ण सेवा करने की है। सभी विभिन्न योग प्रक्रियाएँ धीरे-धीरे भगवान के प्रेम की ओर ले जाती हैं, और भगवान कृष्ण का उद्देश्य संतान आत्माओं को इस सुखद स्थिति में पुनः स्थापित करना है। चैतन्य महाप्रभु इस युग के लिए सर्वोच्च योग प्रक्रिया, कृष्ण के पवित्र नाम के जाप के माध्यम से इस पूर्णता को आसानी से उपलब्ध करा रहे हैं।
