ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूत: शरीरिणाम् ।
आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे ॥ १० ॥
अनुवाद
वेदों के परम ज्ञान से सराबोर होकर और ऐसे ज्ञान के चरम उद्देश्य को व्यवहार में उतारकर, तुम शुद्ध आत्मता को समझ सकोगे और तब तुम्हारा मन संतुष्ट हो जाएगा। उस समय तुम सभी जीवों के, देवताओं समेत, प्रिय बन जाओगे और कोई भी जीवन की अशांति तुम्हें परेशान नहीं कर सकेगी।
By being equipped with the conclusive knowledge of the Vedas and realizing the ultimate purpose of such knowledge in practice, you will be able to experience the pure Self and thus your mind will be satisfied. At that time you will become dear to all living beings, including the Gods, and then you will not be stopped by any disturbance of life.
तात्पर्य
जैसा की भगवद गीता में समझाया गया है, जिसका मन भौतिक इच्छा से मुक्त है वह देवताओं की पूजा में अरुचि रखने लगता है, क्योंकि इस पूजा का उद्देश्य भौतिक उन्नति है। हालाँकि, देवता कभी भी उनसे नाराज़ नहीं होते जो भगवान कृष्ण के शुद्ध भक्त बन जाते हैं और अपनी सारी पूजा भगवान को अर्पित कर देते हैं। देवता स्वयं भगवान कृष्ण के विनम्र सेवक हैं, जैसा कि पृथ्वी पर भगवान कृष्ण के व्यतीत किए गए समय में पर्याप्त रूप से प्रदर्शित किया गया था। जो हर किसी के शरीर में मौजूद शाश्वत आत्मा का अनुभव कर सकता है वह निश्चित रूप से सभी जीवित प्राणियों के लिए प्रिय बन जाता है। चूँकि वह हर किसी को गुणात्मक रूप से अपने बराबर देखता है, इसलिए वह किसी से ईर्ष्या नहीं करता है और न ही किसी अन्य जीवित प्राणी पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश करता है। ईर्ष्या से मुक्त और सभी के शुभचिंतक होने के कारण, ऐसी आत्म-साक्षात्कारी आत्मा स्वाभाविक रूप से सभी के लिए प्रिय है। जैसा कि सिक्स गोस्वामी को लिखे गीत में कहा गया है, धीरधीर-जन-प्रियौ प्रिय-करौ निर्मत्सरौ पूजितौ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥