शुद्धिर्नृणां न तु तथेड्य दुराशयानां
विद्याश्रुताध्ययनदानतप:क्रियाभि: ।
सत्त्वात्मनामृषभ ते यशसि प्रवृद्ध-
सच्छ्रद्धया श्रवणसम्भृतया यथा स्यात् ॥ ९ ॥
अनुवाद
हे सर्वश्रेष्ठ, जिनकी चेतना माया से दूषित है, वे मात्र साधारण पूजा, वेदों का अध्ययन, दान, तपस्या और कर्मकांडों द्वारा खुद को शुद्ध नहीं कर सकते। हमारे स्वामी, जिन पवित्र आत्माओं ने आपके गौरव पर अटूट आध्यात्मिक विश्वास विकसित किया है, उन्हें एक शुद्ध अस्तित्व की अवस्था प्राप्त होती है जो ऐसी आस्था से रहित लोगों को कभी प्राप्त नहीं हो सकती।
O Best One, those whose consciousness is polluted by delusion cannot purify themselves merely by ordinary worship, study of the Vedas, charity, austerities and ceremonies. Our Lord, those pure souls who have developed transcendental devotion towards Your glory attain a pure birth which is never attained by those devoid of such devotion.
तात्पर्य
यदि शुद्ध भक्त में उपरोक्त योग्यताएँ, जैसे वैदिक अध्ययन और तपस्या, न भी हों, यदि भगवान कृष्ण में उसकी अटल श्रद्धा है तो प्रभु उसकी भक्ति की वजह से उसकी रक्षा करेंगे। दूसरी ओर, यदि कोई अपनी भौतिक योग्यताओं, सामान्य पवित्रता सहित, पर झूठा अभिमान करता है, लेकिन कृष्ण के गुणों को सुनने और जप करने के लिए खुद को समर्पित नहीं करता है, तो परिणाम अंततः शून्य होगा। भौतिक पवित्रता, दान या विद्वता किसी भी मात्रा में पारलौकिक आत्मा को शुद्ध नहीं कर सकती है। केवल पारलौकिक सर्वोच्च प्रभु ही हृदय में अपनी कृपा प्रदान करके पारलौकिक जीवित प्राणी को शुद्ध कर सकते हैं। देवता उनके सौभाग्य पर अचंभित थे। कृष्ण के बारे में सुनने से भी व्यक्ति सभी पूर्णता प्राप्त कर लेता है, लेकिन वे प्रभु के स्वयं के शहर में प्रवेश कर चुके थे और उन्हें अपने सामने खड़ा देख रहे थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥