श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  11.6.8 
त्वं मायया त्रिगुणयात्मनि दुर्विभाव्यं
व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थ: ।
नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै
यत् स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्य: ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
हे अजित प्रभुक, आप स्वयं के भीतर त्रिगुणात्मक मायाशक्ति से अचिन्त्य व्यक्त जगत का सृजन, पालन और संहार करते हैं। आप माया के सर्वोच्च नियंत्रक की तरह, प्रकृति के गुणों की परस्पर क्रिया में दिखाई पड़ते हैं। इसके बावजूद, भौतिक कार्यों का आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आप सदैव अपने शाश्वत भक्ति आनंद में ही लीन रहते हैं। इसलिए आपके लिए किसी भौतिक संदूषण की आशंका नहीं की जा सकती है।
 
हे अजित प्रभुक, आप स्वयं के भीतर त्रिगुणात्मक मायाशक्ति से अचिन्त्य व्यक्त जगत का सृजन, पालन और संहार करते हैं। आप माया के सर्वोच्च नियंत्रक की तरह, प्रकृति के गुणों की परस्पर क्रिया में दिखाई पड़ते हैं। इसके बावजूद, भौतिक कार्यों का आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आप सदैव अपने शाश्वत भक्ति आनंद में ही लीन रहते हैं। इसलिए आपके लिए किसी भौतिक संदूषण की आशंका नहीं की जा सकती है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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