श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  11.6.7 
श्रीदेवा ऊचु:
नता: स्म ते नाथ पदारविन्दं
बुद्धीन्द्रियप्राणमनोवचोभि: ।
यच्चिन्त्यतेऽन्तर्हृदि भावयुक्तै-
र्मुमुक्षुभि: कर्ममयोरुपाशात् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
देवता कहने लगे: हे प्रभु, बड़े-बड़े योगी कठिन कर्मों के बंधन से मुक्ति पाने के प्रयास में अपने हृदय में आपके चरणों का ध्यान अत्यंत भक्ति के साथ करते हैं। हम देवतागण अपनी बुद्धि, इंद्रियाँ, प्राण, मन और वाणी को आपको समर्पित करते हुए, आपके चरणकमलों पर नतमस्तक होते हैं।
 
The gods said: O Lord, great Yogis, while trying to get freedom from the difficult bondage of karma, meditate on your feet in their hearts with great devotion. We, the gods, surrender our intellect, senses, life, mind and speech to you and bow down at your feet.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, इस श्लोक में 'स्म' शब्द आश्चर्य को दर्शाता है। देवता आश्चर्यचकित थे कि कैसे महान योगी भी भगवान के चरणकमलों का केवल अपने हृदय में मनन कर पाते हैं, तो द्वारका नगरी में आने वाले देवता, पूर्ण परमात्मा श्री कृष्ण का पूर्ण रूप अपने सामने देख पा रहे थे। इसलिए शक्तिशाली देवता प्रभु के सामने छड़ी की तरह गिर पड़े। इस तरह के पूर्ण नमन (जिसे दंडवत कहते हैं, "छड़ी के समान") को इस प्रकार वर्णित है:

दोर्भ्यां पदाभ्यां जानुभ्यां

उरसा शिरसा दृशा

मनसा वचसा चेति

प्रणामोऽष्टांग ईरितः

"आठ अंगों के साथ नमन दो भुजाओं, दोनों पैरों, दोनों घुटनों, छाती, सिर, आँखों, मन और वाणी की शक्ति द्वारा किया जाता है।"

भौतिक प्रकृति की धाराएँ बहुत शक्तिशाली हैं, इसलिए व्यक्ति को भगवान के चरणकमलों को दृढ़ता से पकड़ना चाहिए। नहीं तो, इंद्रिय तृप्ति और मानसिक अटकलों की हिंसक लहरें निस्संदेह व्यक्ति को परम प्रभु के प्रेमपूर्ण सेवक के रूप में उसके शाश्वत, संवैधानिक पद से दूर कर देंगी, और फिर वह यहां कही गई कठोर बंधन में गिर जाएगा उरु-पाशात, "एक बहुत शक्तिशाली मायावी नेटवर्क।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)