शय्यासनाटनस्थानस्नानक्रीडाशनादिषु ।
कथं त्वां प्रियमात्मानं वयं भक्तास्त्यजेमहि ॥ ४५ ॥
अनुवाद
हे प्रभु, आप परमात्मा हैं और इसलिए आप हमें सर्वाधिक प्रिय हैं। हम आपके भक्त हैं और हम आपको कभी त्याग नहीं सकते या आपके बिना एक पल भी नहीं रह सकते। चाहे हम लेट रहे हों, बैठे हों, चल रहे हों, खड़े हों, स्नान कर रहे हों, खेल रहे हों, खा रहे हों या कुछ और कर रहे हों, हम लगातार आपकी सेवा में लगे रहते हैं।
O Lord, You are the Supreme Personality of Godhead and therefore You are most dear to us. We are all Your devotees, so how can we abandon You or live without You even for a moment? Whether we lie down, sit, walk, stand, bathe, play, eat or do anything else, we are constantly engaged in Your service.
तात्पर्य
भगवान् कृष्ण की सेवा में लगातार संलग्न रहना चाहिए। कृष्ण के विषय में सुनने से और उनकी सेवा करने से हम परमेश्वर से अलग कुछ भोगने की भ्रम परित्याग कर सकते हैं। यदि हम इस प्रकार के सुनने और सेवा करने की अवहेलना करते हैं, तो हमारे मन प्रभु की माया से विचलित हो जाएँगे, और संसार को कृष्ण से अलग देखकर, हम इसे अपनी इन्द्रियों की संतुष्टि के लिए बने स्थान के रूप में लेंगे। यह घोर अज्ञानता जीव को परेशानी के सिवा और कुछ नहीं देती।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥