श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  11.6.44 
तव विक्रीडितं कृष्ण नृणां परममङ्गलम् ।
कर्णपीयूषमासाद्य त्यजन्त्यन्यस्पृहां जना: ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
हे कृष्ण, तुम्हारी लीलाएँ मानव जाति के लिए अत्यंत शुभ हैं और कानों के लिए मादक पेय के समान हैं। ऐसी लीलाओं का आनंद लेने के बाद लोग दूसरी चीजों की इच्छाएँ भूल जाते हैं।
 
O Krishna, Your pastimes are extremely auspicious for the human race and are like an intoxicating drink to the ears. Upon savoring such pastimes, people forget their desires for other things.
तात्पर्य
अन्यास्पृहा या "कृष्ण के अतिरिक्त चीजों की कामना" भौतिक इच्छा को इंगित करता है जैसे की पत्नी, बच्चे, धन और इत्यादि। अंततः भौतिकवादी अपनी व्यक्तिगत सुख और संतुष्टि के लिए धार्मिक मोक्ष की इच्छा कर सकता है, लेकिन ऐसी सभी इच्छाएँ सांसारिक हैं, क्योंकि आध्यात्मिक मंच पर शुद्ध आत्मा केवल प्रभु की प्रसन्नता और प्रभु की सेवा के बारे में सोचती है। इसलिए, एक शुद्ध भक्त कृष्ण को कभी नहीं छोड़ सकता, यहाँ तक कि एक पल के लिए भी नहीं, हालाँकि कृष्ण की प्रसन्नता के लिए वह पूरे ब्रह्मांड को छोड़ सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)