श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  11.6.30 
यद्यसंहृत्य द‍ृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् ।
गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्‍क्ष्यति ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
यदि मैंने यदुवंश के इन बेहद अभिमानी सदस्यों को हटाए बिना इस संसार को छोड़ दिया, तो उनके असीमित विस्तार की बाढ़ से पूरा विश्व नष्ट हो जाएगा।
 
If I have to leave this world without removing these extremely proud members of the Yadu dynasty, then the entire world will be destroyed by the surge of their endless expansion.
तात्पर्य
जैसे-जैसे ज्वार की लहरें तट की सीमा को पार कर निरपराध लोगों पर कहर ढाती हैं, उसी प्रकार यह आसन्न ख़तरा था कि शक्तिशाली यादव वंश सामाजिक और राजनीतिक नियंत्रण की सभी सीमाओं का उल्लंघन कर विस्तार कर सकता है। यादव वंश के सदस्य ईश्वरत्व के व्यक्तित्व के साथ अपने स्पष्ट पारिवारिक संबंध के कारण गर्वित हो गए थे। यद्यपि वे अत्यधिक धार्मिक और ब्राह्मण संस्कृति के प्रति समर्पित थे, वे, जैसा कि शब्द 'दृप्तनाम' द्वारा इंगित किया गया है, कृष्ण के साथ अपने संबंध के कारण घमंड से प्रभावित हो गए थे। इसके अतिरिक्त, कृष्ण के प्रति उनके गहन प्रेम के कारण, आध्यात्मिक जगत में भगवान के प्रस्थान के बाद निश्चित रूप से उन्हें इतना तीव्र अलगाव महसूस होगा कि वे पागल हो जाएँगे और इस प्रकार पृथ्वी पर एक असहनीय बोझ बन जाएँगे। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने हालाँकि यह बताया है कि पृथ्वी स्वयं, कृष्ण के प्रति अनुराग के कारण, कृष्ण के परिवार के सदस्यों को कभी भी एक स्वागत योग्य बोझ के अतिरिक्त कुछ नहीं मानेगी। फिर भी, कृष्ण इस बोझ को हटाना चाहते थे। इसका उदाहरण यह है कि अपने पति की खुशी के लिए एक सुंदर युवा पत्नी अपने आप को कई सुनहरे आभूषणों से सजा सकती है। ये आभूषण नाजुक पत्नी के लिए एक तकलीफदेह बोझ होते हैं, लेकिन हालाँकि वह इस बोझ को सहन करने के लिए तैयार रहती है, प्रेमी पति अपनी पत्नी की खुशी के लिए आभूषण हटा देता है। इसलिए, भगवान ने "एक औंस रोकथाम एक पाउंड इलाज के बराबर है" की बुद्धिमत्ता को लागू करने की इच्छा से, पृथ्वी से यादव वंश के बोझ को हटाने के लिए सावधानियाँ बरतीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)