श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  11.6.24 
यानि ते चरितानीश मनुष्या: साधव: कलौ ।
श‍ृण्वन्त: कीर्तयन्तश्च तरिष्यन्त्यञ्जसा तम: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, कलियुग में पवित्र और सन्त-जन, आपके दिव्य कार्यों के श्रवण से और उनका गुणगान करके, इस युग के अंधकार को सरलता से पार कर लेंगे।
 
O Lord, in Kali-yuga, the pious and saintly persons who hear of Your transcendental deeds and sing Your praises will easily cross the darkness of this age.
तात्पर्य
दुर्भाग्यवश, कलियुग में बहुत से लोग अधिकृत वैदिक साहित्यों के आकर्षण में नहीं आते। भगवान के व्यक्तित्व की महिमा के श्रवण और गायन की अतिमानवीय प्रक्रिया को तुच्छ समझते हुए, वे रेडियो और टेलीविजन, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं आदि में निकलने वाले निरर्थक तथा मनोरंजक प्रसारणों को सुनना अधिक पसंद करते हैं। सच्चे अध्यात्मिक गुरु से कृष्ण के बारे में सुनने के बजाय, वे निरंतर हर चीज के बारे में अपनी राय देते रहते हैं, जब तक कि समय के प्रभाव से खींचे नहीं जाते। भौतिक सृष्टि के अस्थायी, सीमित स्वरूपों का अध्ययन करने के बाद, वे अधीरता से यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि परम सत्य निराकार है। ऐसे लोग वास्तव में कृष्ण की भ्रामक माया शक्ति की ही पूजा कर रहे होते हैं, जिसे उनके जिद्दी सिर पर प्रहार करने का अधिकार दिया गया है। यदि इसके बजाय, लोग सच्चे स्रोतों से सीधे कृष्ण के बारे में श्रवण करेंगे तो वे अपने जीवन की सभी समस्याओं का समाधान बहुत ही आसानी से कर लेंगे। कलियुग के लोग लगातार कई मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और अस्तित्वगत समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं। लेकिन इन सभी दुःस्वप्न जैसी समस्याओं को उस समय तुरंत दूर किया जा सकता है, जब कोई भगवान के व्यक्तित्व के अतिमानवीय यथार्थ को समझता है, जो शाश्वत, आनंद और ज्ञान से परिपूर्ण हैं और भौतिक ऊर्जा के विस्मयकारी प्रकटीकरण के परे हैं। ईश्वर इस ब्रह्मांड में इसलिए प्रकट होते हैं ताकि लोग उनकी वास्तविक गतिविधियों को देख सकें, उनके बारे में श्रवण कर सकें और उनका गुणगान कर सकें। कलियुग के इस कठिन समय में हमें सभी को इसका गंभीरता से लाभ उठाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)