श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  11.6.18 
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-
भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डै: ।
पत्न्‍यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणै-
र्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभ्व्य: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आप सोलह हजार अति मनोहर राजसी पत्नियों के साथ निवास कर रहे हैं। वो अपनी अत्यन्त लज्जाशील और मुस्कान-भरी नज़रों और सुन्दर चाप-सी भौंहों से आपको अपने उत्कट प्रेम का सन्देश भेजती हैं। किन्तु वे आपके मन और इन्द्रियों को विचलित करने में बिल्कुल सक्षम नहीं हैं।
 
O Lord, you are living with sixteen thousand very beautiful royal wives. With their very shy and smiling glances and beautiful bow-shaped eyebrows, they send you messages of their eager love. But they are completely unable to distract your mind and senses.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी भौतिक वस्तु प्रभु की इंद्रियों को आकर्षित नहीं कर सकती। अब इस श्लोक में यह प्रदर्शित किया गया है कि प्रभु की आध्यात्मिक कामुकता की तृप्ति की इच्छा भी नहीं है। कृष्ण अपने आप में पूर्ण हैं। वे सभी आनंद के भंडार हैं और वे किसी भी भौतिक या आध्यात्मिक वस्तु के प्रति आसक्त नहीं हैं। यह तर्क दिया जा सकता है कि कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को प्रसन्न करने के लिए स्वर्ग से पारिजात का फूल चुराया और इस प्रकार अपनी प्यारी पत्नी के नियंत्रण में रहने वाले पति प्रतीत हुए। लेकिन यद्यपि कृष्ण कभी-कभी अपने भक्तों के प्रेम से अभिभूत हो जाते हैं, वे कभी भी एक साधारण, कामुक भौतिकवादी व्यक्ति की तरह भोग की इच्छा से प्रभावित नहीं होते। अभक्त भगवान और उनके शुद्ध भक्तों के बीच विनिमय की गई अपार प्रेम भावनाओं को नहीं समझ सकते। कृष्ण हमारी तीव्र प्रेम भावना से जीते जा सकते हैं और इस प्रकार शुद्ध भक्त भगवान को नियंत्रित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, वृंदावन की बुजुर्ग गोपियां कृष्ण को नचाने के लिए विभिन्न तालों में हाथ बजाती थीं और द्वारका में सत्यभामा ने कृष्ण को अपने लिए उनके प्यार के प्रमाण के रूप में एक फूल लाने का आदेश दिया। श्रीनिवास आचार्य के षट गोस्वामी को गीत में वर्णित है, गोपी-भाव-रसामृत-अब्धि-लहरी-कल्लोल-मग्नौ मुहुः: भगवान और उनके शुद्ध भक्त के बीच प्रेम आध्यात्मिक आनंद का सागर है। लेकिन साथ ही, कृष्ण पूरी तरह से आत्म-संतुष्ट रहते हैं। कृष्ण ने उदासीनतापूर्वक व्रज-भूमि की अतुलनीय युवतियों गोपियों का साथ छोड़ दिया और अपने चाचा अक्रूर के अनुरोध पर मथुरा चले गए। इस प्रकार न तो वृंदावन की गोपियां और न ही द्वारका की रानियां कृष्ण में भोग भावना जगा सकीं। जब सब कुछ कहा और किया जाता है, तो इस दुनिया में आनंद का अर्थ सेक्स होता है। लेकिन यह सांसारिक यौन आकर्षण आध्यात्मिक दुनिया में कृष्ण और उनके शाश्वत सहयोगियों के बीच अतिमानवीय प्रेमपूर्ण संबंधों का केवल एक विकृत प्रतिबिंब है। वृंदावन की गोपियाँ ग्रामीण लड़कियाँ हैं, जबकि द्वारका की रानियाँ अभिजात युवतियाँ हैं। लेकिन गोपियां और रानियाँ दोनों ही कृष्ण के लिए प्रेम से अभिभूत हैं। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में, कृष्ण सुंदरता, शक्ति, धन, प्रसिद्धि, ज्ञान और त्याग की उच्चतम पूर्णता प्रदर्शित करते हैं और इस तरह उनकी अपनी सर्वोच्च स्थिति से वे पूरी तरह से संतुष्ट हैं। वे केवल गोपियों और रानियों के लिए उनसे आध्यात्मिक प्रेमपूर्ण संबंधों का आदान-प्रदान करते हैं। केवल मूर्ख ही सोचते हैं कि भगवान कृष्ण उन विकृत भ्रामक सुखों से आकर्षित हो सकते हैं जिनसे हम गरीब जीवित आत्माएं इतनी आँख बंद करके जुड़ी हुई हैं। इसलिए हर किसी को भगवान के सर्वोच्च पारलौकिक स्थान को पहचानना चाहिए और उनके सामने आत्मसमर्पण करना चाहिए। यही देवताओं के इस कथन का स्पष्ट निहितार्थ है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)