"श्री जीवा गोस्वामी बताते है कृष्ण-वर्णम का मतलब है श्री कृष्ण चैतन्य। कृष्ण-वर्णम और कृष्ण चैतन्य बराबर है। कृष्ण नाम भगवान कृष्ण और भगवान चैतन्य कृष्ण दोनों के नाम के साथ आता है। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान का परम व्यक्तित्व है, लेकिन वह हमेशा कृष्ण का वर्णन करने में संलग्न रहतें है और इस प्रकार भगवान के नाम और रूप का जाप और स्मरण करके परमानंद का आनंद लेतें है। भगवान कृष्ण स्वयं भगवान चैतन्य के रूप में प्रकट होते हैं ताकि सर्वोत्तम उपदेश दिया जा सके। वर्णायति का मतलब है 'कहना' या 'वर्णन करना'। भगवान चैतन्य हमेशा कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करते है और उसका वर्णन भी करते है, और क्योंकि वह स्वयं कृष्ण है, जो कोई भी उनसे मिलेगा वह स्वतः ही कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करेगा और बाद में अन्य लोगो को भी बताएगा। वह हमे दिव्य कृष्ण चेतना से भर देते है, जिससे की हम दिव्य आनंद में विलीन हो जाते है। सभी मामलों में इसलिए, वह सभी के सामने कृष्ण के रूप में प्रकट होते है, या तो व्यक्तित्व या ध्वनि अथवा दोनों से। भगवान चैतन्य को देखते ही एक बार में ही भगवान कृष्ण को याद आ जाता है। इसलिए कोई भी उन्हें विष्णु तत्व के रूप में स्वीकार कर सकता है। दूसरे शब्दों में, भगवान चैतन्य स्वयं भगवान कृष्ण है।
"संगोपांगस्त्र पारसदम यह और दर्शाता है कि भगवान चैतन्य ही भगवान कृष्ण है। उनका शरीर हमेशा चंदन के गहनों और चंदन के लेप से सजाया रहता है। उनकी अद्भुत सुंदरता से वह इस युग के सभी लोगो को वश में कर लेते हैं। अन्य अवतारों में भगवान ने कभी कभी राक्षसों को हराने के लिए हथियारों का प्रयोग किया है, लेकिन इस युग में भगवान उन्हें अपनी सर्व-आकर्षक आकृति से चैतन्य महाप्रभु के रूप में वश में करते हैं। श्री जीवा गोस्वामी बतातें है कि राक्षसों को वश करने के लिए उनकी सुंदरता ही उनका अस्त्र या हथियार है। क्योंकि वह सर्व आकर्षक हैं, यह समझना चाहिए कि सभी देवता उनके साथ उनके साथी के रूप में रहतें है। उनके कार्य असामान्य और उनके सहयोगी अद्भुत हैं। जब उन्होंने संकीर्तन आंदोलन का प्रसार किया, तब उन्होंने बहुत से महान विद्वानों और आचार्यों को आकर्षित किया, विशेषकर बंगाल और उड़ीसा में। भगवान चैतन्य हमेशा अपने श्रेष्ठ सहयोगियों जैसे भगवान नित्यानंद, अद्वैत, गदाधर और श्रीवास के साथ रहतें है।
"श्री जीवा गोस्वामी वैदिक साहित्य से एक श्लोक का उद्धरण देते हैं जिसमें कहा गया है कि यज्ञ प्रदर्शन या औपचारिक कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह टिप्पणी करते है कि इस तरह के बाहरी, घमंडीय प्रदर्शन में व्यस्त रहने के बजाय, सभी लोग, जाति, रंग या पंथ की परवाह किए बिना, एक साथ एकत्रित हो सकते हैं और भगवान चैतन्य की पूजा के लिए हरे कृष्ण का जाप कर सकते हैं। कृष्ण वर्णं त्विशा कृष्णम यह इंगित करता है कि कृष्ण नाम को प्रमुखता दी जानी चाहिए। भगवान चैतन्य ने कृष्ण चेतना की शिक्षा दी और उन्होंने कृष्ण नाम का जाप किया। इसलिए, भगवान चैतन्य की पूजा करने के लिए, सभी को मिलकर महा मंत्र - हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जाप करना चाहिए। चर्च, मंदिर या मस्जिद में पूजा का प्रचार करना संभव नहीं है क्योंकि लोगो ने उसमे रुचि खो दी है। लेकिन कहीं भी और हर जगह, लोग हरे कृष्ण का जाप कर सकते हैं। इस प्रकार भगवान चैतन्य की पूजा करते हुए, वह सर्वोच्च गतिविधि कर सकते हैं और सर्वोच्च धार्मिक उदेश्य को पूरा कर सकते हैं।
"भगवान चैतन्य के प्रसिद्ध शिष्य, श्रील सर्वभौम भट्टाचार्य ने कहा था: 'पारलौकिक भक्ति सेवा का सिद्धांत खो गया था, श्री कृष्ण चैतन्य भक्ति की प्रक्रिया को फिर से प्रदान करने के लिए आए हैं। वह इतने दयालु हैं कि वह कृष्ण के प्रेम का वितरण कर रहे हैं। सभी को उनके चरण-कमलों की ओर अधिक से अधिक आकर्षित होना चाहिए, जैसे भिनभिनाते हुए मधुमक्खियाँ कमल के फूल की ओर आकर्षित होती हैं।' चैतन्य महाप्रभु के अवतार का वर्णन श्री विष्णु-सहस्र-नाम में भी किया गया है, जो कि महाभारत के दान-धर्म-पर्व के अध्याय 189 में प्रकट होता है। श्रील जीव गोस्वामी ने इस संदर्भ को उद्धृत किया है: सुवर्ण-वर्णो हेमंगो वरांगश्चंदनांगदी। "अपने प्रारंभिक लीलाओं में वह एक गृहस्थ के रूप में स्वर्णिम रंग के साथ प्रकट होते हैं। उनके अंग सुंदर हैं, और चंदन के गूदे से लिपटा उनका शरीर पिघले हुए सोने जैसा लगता है।" उन्होंने यह भी उद्धृत किया है, संन्यास-कृच्छमः शांतो निष्ठा-शांति-परायणः: "अपनी बाद की लीलाओं में वह संन्यास ग्रहण करते हैं, तथा वह समभाव रखने वाले और शांतिपूर्ण हैं। वह शांति और भक्ति का सर्वोच्च निवास हैं, क्योंकि वह निःसंग निराकार भक्तों को चुप कराते हैं।"
