श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  11.5.24 
त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखल: ।
हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षण: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
त्रेतायुग में भगवान प्रकट होते हैं एक लाल रंग में। उनकी चारों भुजाएँ सुनहरे रंग के केशों से सुशोभित होती हैं। उन्हें पहनाई जाती है वो तिमुनी पेटी, जो उन्हें सर्ववेदों का ज्ञाता घोषित करती है। उनके ज्ञान का प्रमाण बनते हैं, ऋग, साम और यजुर्वेद, जो अपने में वैदिक यज्ञ के ज्ञान से परिपूर्ण हैं। उनके प्रतीक स्रुक्, स्रुवा, आदि यज्ञ के पात्र बनते हैं।
 
त्रेतायुग में भगवान प्रकट होते हैं एक लाल रंग में। उनकी चारों भुजाएँ सुनहरे रंग के केशों से सुशोभित होती हैं। उन्हें पहनाई जाती है वो तिमुनी पेटी, जो उन्हें सर्ववेदों का ज्ञाता घोषित करती है। उनके ज्ञान का प्रमाण बनते हैं, ऋग, साम और यजुर्वेद, जो अपने में वैदिक यज्ञ के ज्ञान से परिपूर्ण हैं। उनके प्रतीक स्रुक्, स्रुवा, आदि यज्ञ के पात्र बनते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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