एक समान श्लोक ऋग्वेद (8.4.19) और शुक्लयजुर्वेद (34.11) और अथर्ववेद (19.66) में पाया जाता है:
ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्
बाहू राजन्यः कृतः
ऊरु तदस्य यद्वैश्यः
पद्भ्यां शूद्रोऽजायत
"ब्राह्मण उनके मुख के रूप में प्रकट हुए, राजा उनकी भुजाओं के रूप में निर्मित हुए, वैश्य उनकी जाँघों के रूप में और शूद्र उनके पैरों से पैदा हुए।"
यह समझा जाता है कि भगवान के प्रति शुद्ध भक्ति सेवा का वर्णन दो योगेंद्र, ड्रुमिला और आवीरहोत्र द्वारा पहले ही किया जा चुका है। कामस मुनि अब वर्ण व्यवस्था-धर्म की प्रणाली का वर्णन करते हैं, क्योंकि यह प्रणाली उन लोगों को क्रमशः शुद्ध करने के लिए है जो परम भगवान के शत्रु हैं, उन्हें ईश्वर के प्रेम की अपनी संवैधानिक स्थिति में वापस लाते हैं। इसी तरह, विराट-रूप, या भगवान का सार्वभौमिक रूप, एक काल्पनिक रूप है जिसका उद्देश्य स्थूल भौतिकवादियों को भगवान की स्थिति को धीरे-धीरे समझने में मदद करना है। चूंकि मूर्ख भौतिकवादी पदार्थ से परे कुछ भी नहीं समझ सकता, इसलिए उसे पूरे ब्रह्मांड को परमेश्वर के शरीर के व्यक्तिगत रूप के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। निराकार की अवैयक्तिक अवधारणा भगवान की आध्यात्मिक शक्ति की किसी भी अवधारणा के बिना अस्थायी भौतिक विविधता का मात्र एक निषेध है। अवैयक्तिक दृष्टिकोण भौतिक सट्टा अवधारणा का एक और प्रकार है। सर्वोच्च भगवान hlādinī, या असीमित आनंद, sandhinī, या शाश्वत अस्तित्व और saṁvit, या सर्वज्ञता के प्रमुख शीर्षकों के तहत आध्यात्मिक शक्तियों से भरे हुए हैं। इस श्लोक से यह समझा जाता है कि भगवान के सार्वभौमिक रूप से उत्पन्न वर्णाश्रम-धर्म प्रणाली भगवान द्वारा एक कार्यक्रम की पेशकश है जो वातानुकूलित आत्माओं को एक पूर्ण सामाजिक और धार्मिक प्रणाली में जोड़ती है जो धीरे-धीरे उन्हें घर वापस लाती है, वापस ईश्वर के पास।
