श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  11.5.2 
श्रीचमस उवाच
मुखबाहूरुपादेभ्य: पुरुषस्याश्रमै: सह ।
चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादय: पृथक् ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
श्री चमस ने कहा: ब्राह्मणों से आरंभ होने वाले चारों वर्ण, प्रकृति के गुणों के अलग-अलग संयोजनों से भगवान के विराट रूप के मुख, बाहों, जाँघों और पैरों से उत्पन्न हुए। इसी प्रकार चार आध्यात्मिक आश्रमों की भी उत्पत्ति हुई।
 
Sri Chamasa said: The four Varnas (castes) starting from Brahman originated from the face, arms, thighs and feet of the cosmic form of the Lord by various combinations of the modes of nature. Similarly, the four spiritual ashramas also originated.
तात्पर्य
जो लोग भगवान की भक्ति सेवा के प्रति सहज रूप से आकर्षित नहीं हैं, उन्हें चार सामाजिक व्यवस्थाओं और चार आध्यात्मिक व्यवस्थाओं की वर्णव्यवस्था का पालन करके धीरे-धीरे शुद्ध किया जा सकता है। श्रीधर स्वामी के अनुसार, ब्राह्मण सद्गुणों से जन्म लेते हैं, क्षत्रिय सद्गुणों और तेज के संयोजन से, वैश्य तेज और अज्ञानता के संयोजन से और शूद्र अज्ञानता के गुण से जन्म लेते हैं। जिस प्रकार चारों सामाजिक व्यवस्थाएँ भगवान के सार्वभौमिक स्वरूप के मुख, भुजाओं, जाँघों और पैरों से उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार ब्रह्मचारी भगवान के हृदय से, गृहस्थ उनके कमर से, वानप्रस्थ उनके वक्ष से और सन्यास उनके सिर से उत्पन्न होते हैं।

एक समान श्लोक ऋग्वेद (8.4.19) और शुक्लयजुर्वेद (34.11) और अथर्ववेद (19.66) में पाया जाता है:

ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्

बाहू राजन्यः कृतः

ऊरु तदस्य यद्वैश्यः

पद्भ्यां शूद्रोऽजायत

"ब्राह्मण उनके मुख के रूप में प्रकट हुए, राजा उनकी भुजाओं के रूप में निर्मित हुए, वैश्य उनकी जाँघों के रूप में और शूद्र उनके पैरों से पैदा हुए।"

यह समझा जाता है कि भगवान के प्रति शुद्ध भक्ति सेवा का वर्णन दो योगेंद्र, ड्रुमिला और आवीरहोत्र द्वारा पहले ही किया जा चुका है। कामस मुनि अब वर्ण व्यवस्था-धर्म की प्रणाली का वर्णन करते हैं, क्योंकि यह प्रणाली उन लोगों को क्रमशः शुद्ध करने के लिए है जो परम भगवान के शत्रु हैं, उन्हें ईश्वर के प्रेम की अपनी संवैधानिक स्थिति में वापस लाते हैं। इसी तरह, विराट-रूप, या भगवान का सार्वभौमिक रूप, एक काल्पनिक रूप है जिसका उद्देश्य स्थूल भौतिकवादियों को भगवान की स्थिति को धीरे-धीरे समझने में मदद करना है। चूंकि मूर्ख भौतिकवादी पदार्थ से परे कुछ भी नहीं समझ सकता, इसलिए उसे पूरे ब्रह्मांड को परमेश्वर के शरीर के व्यक्तिगत रूप के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। निराकार की अवैयक्तिक अवधारणा भगवान की आध्यात्मिक शक्ति की किसी भी अवधारणा के बिना अस्थायी भौतिक विविधता का मात्र एक निषेध है। अवैयक्तिक दृष्टिकोण भौतिक सट्टा अवधारणा का एक और प्रकार है। सर्वोच्च भगवान hlādinī, या असीमित आनंद, sandhinī, या शाश्वत अस्तित्व और saṁvit, या सर्वज्ञता के प्रमुख शीर्षकों के तहत आध्यात्मिक शक्तियों से भरे हुए हैं। इस श्लोक से यह समझा जाता है कि भगवान के सार्वभौमिक रूप से उत्पन्न वर्णाश्रम-धर्म प्रणाली भगवान द्वारा एक कार्यक्रम की पेशकश है जो वातानुकूलित आत्माओं को एक पूर्ण सामाजिक और धार्मिक प्रणाली में जोड़ती है जो धीरे-धीरे उन्हें घर वापस लाती है, वापस ईश्वर के पास।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)