श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  11.5.15 
द्विषन्त: परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम् ।
मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्‍नेहा: पतन्त्यध: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
अपने मृतक आत्मीय भौतिक शरीर और परिवार-सुविधाओं से बद्ध व्यक्ति पूरी तरह बंध जाते हैं। ऐसी अंहकारी तथा मूर्ख अवस्था में बंधे हुए जीव अन्य जीवों के साथ-साथ सर्वोच्च भगवान हरि से भी ईर्ष्या करते हैं, जो सभी प्राणियों के हृदय में वास करते हैं। इस प्रकार दूसरों से ईर्ष्या करके बंधे हुए जीव धीरे-धीरे नरक में गिरते हैं।
 
Conditioned souls become completely bound by their affection for their corpse-like material bodies and for their relatives and possessions. In such a proud and foolish state, conditioned souls begin to hate not only other living entities but also the Supreme Lord Hari, who resides in the heart of all living beings. Thus, by insulting others out of jealousy, conditioned souls gradually fall into hell.
तात्पर्य
भौतिक व्यक्ति पशुओं की हत्या करके उनकी ईर्ष्या व्यक्त करते हैं। इसी तरह, संतानित आत्माएं अन्य मानवों और स्वंय भगवान से भी ईर्ष्या करने लगती हैं, जो हर किसी के शरीर में रहते हैं। वे भगवान की ईर्ष्या इस तरह से करते हैं कि नास्तिकता विज्ञान या छद्म-दर्शन का प्रचार करते हैं जिसमें वे इस तथ्य का उपहास करते हैं कि हर कोई भगवान का शाश्वत सेवक है। ईर्ष्यालु व्यक्ति युद्ध, आतंकवाद, क्रूर सरकारों और धोखाधड़ी वाली व्यावसायिक उद्यमों को बनाकर अन्य इंसानों के प्रति अपनी कड़वी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। ऐसे ईर्ष्यालु व्यक्तियों के पापमय शरीर बिल्कुल शवों की तरह हैं। फिर भी, ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने भौतिक शरीर की लाश से मोहब्बत करते हैं और अपने बच्चों और शरीर के अन्य विस्तार से और अधिक मोहित हो जाते हैं। ऐसी भावनाएँ झूठे अभिमान पर आधारित हैं। श्रील माधवाचार्य ने हरि-वंश से निम्न छंद उद्धृत किया है:

**"आप्तत्वाद आत्म-शब्दोक्तं**

**स्वस्मिन्नपि परेषु च**

**जीवान् अन्यं न पश्यंति**

**श्रुत्वैवं विद्विषंति च**

**एतांस्त्वम् आसुरान विद्धि**

**लक्षणैः पुरुषाधमान**

"सर्वोपरि को आत्मा कहा जाता है क्योंकि वह स्वयं में और अन्य लोगों के भीतर भी पाया जाता है। कुछ व्यक्ति सर्वोच्च भगवान के वर्णन को सुनकर उत्तेजित हो जाते हैं, और वे खुले तौर पर कहते हैं कि स्वंय से परे कोई श्रेष्ठ जीवन नहीं है। ऐसे व्यक्तियों को राक्षसों के रूप में जाना जाता है। उनके व्यावहारिक लक्षणों से उन्हें मनुष्यों के निम्नतम वर्ग के रूप में समझा जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)