**"आप्तत्वाद आत्म-शब्दोक्तं**
**स्वस्मिन्नपि परेषु च**
**जीवान् अन्यं न पश्यंति**
**श्रुत्वैवं विद्विषंति च**
**एतांस्त्वम् आसुरान विद्धि**
**लक्षणैः पुरुषाधमान**
"सर्वोपरि को आत्मा कहा जाता है क्योंकि वह स्वयं में और अन्य लोगों के भीतर भी पाया जाता है। कुछ व्यक्ति सर्वोच्च भगवान के वर्णन को सुनकर उत्तेजित हो जाते हैं, और वे खुले तौर पर कहते हैं कि स्वंय से परे कोई श्रेष्ठ जीवन नहीं है। ऐसे व्यक्तियों को राक्षसों के रूप में जाना जाता है। उनके व्यावहारिक लक्षणों से उन्हें मनुष्यों के निम्नतम वर्ग के रूप में समझा जाता है।"
