श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  11.5.14 
ये त्वनेवंविदोऽसन्त: स्तब्धा: सदभिमानिन: ।
पशून् द्रुह्यन्ति विश्रब्धा: प्रेत्य खादन्ति ते च तान् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
वे पापी प्राणी जो असली धर्म से अनभिज्ञ हैं, फिर भी खुद को पूर्णतः पवित्र मानते हैं, निर्दोष पशुओं के प्रति बिना किसी ग्लानि के हिंसा करते हैं, जो उन पर पूरी तरह से भरोसा करते हैं, अपने अगले जन्म में, ऐसे पापी प्राणियों को उन्हीं प्राणियों द्वारा खाया जाएगा जिन्हें उन्होंने इस दुनिया में मार डाला है।
 
Those sinful persons, who, despite being ignorant of the true religion, consider themselves to be completely pious, commit violence without remorse against those innocent animals, who are completely trusting towards them. Such sinful persons will be eaten in the next births by the same animals which they slaughter in this world.
तात्पर्य
इस श्लोक से हम उन लोगों की भारी विसंगतियों को साफ़ देख सकते हैं जो भगवान श्री हरि और उनके नियमों के प्रति समर्पण नहीं करते। जैसा कि भागवत में कहा गया है, हरव अभक्तस्य कुतो महद्-गुणाः: वे लोग जो परम प्रभु की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करते वे धीरे-धीरे पापों की ओर बढ़ने लगते हैं जो उनके लिए भयंकर दुख लाते हैं। पश्चिमी देशों जैसे अमरीका में बहुत से लोग गर्व से खुद को बहुत धार्मिक और कभी-कभी भगवान के प्रतिनिधि बताते हैं। अपनी धार्मिकता पर घमंड करने वाले ऐसे लोग नृशंस तरीके से अपार जानवरों को बूचड़खानों में या अपने मन की ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए शिकार पर मारने में कोई डर या संदेह नहीं करते। मिसिसिपी प्रांत में कई बार सुअर को मारने का त्योहार मनाया जाता है, इस त्यौहार में पूरे परिवार खुशी से सुअर को अपनी आँखों के सामने मारते देखते हैं। ठीक इसी तरह, टेक्सास के एक पूर्व राष्ट्रपति अमेरिका के किसी भी सामाजिक अवसर को गाय को मारे बिना पूरा नहीं करते थे। ऐसे लोग खुद को गलती से भगवान के नियमों को सही तरह से मानने वाला समझते हैं और अपनी इस मूर्खता के कारण यथार्थ से दूर भागते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी जानवर को पालता है उसे मारने के लिए, तो वह जानवर को अच्छी तरह से पालता है ताकि वह मोटा हो जाये। इस तरह धीरे-धीरे जानवर अपने होने वाले हत्यारे को अपना पालनहार और स्वामी मानने लगता है। जब आखिर में स्वामी एक तेज चाकू या बंदूक लेकर उस बेबस जानवर के पास जाता है, तो वह जानवर सोचता है, "अरे, मेरे स्वामी मुझसे मज़ाक कर रहे हैं।" आखिरी समय में ही उस जानवर को समझ आता है कि यह तथाकथित स्वामी मौत है। वैदिक साहित्य में यह साफ़ लिखा है कि निर्दोष जानवरों को मारने वाले क्रूर स्वामी निःसंदेह अगले जीवन में उसी तरह से मारे जायेंगे।

मां स भक्षयितामुत्र

यस्य मांसमिहाद्यहम

एतन्मं सस्य मांसत्वं

प्रवदन्ति मनीषिणः

"इस प्राणी जिसका मांस मैं अभी खा रहा हूँ, वह मुझे अगले जीवन में खाएगा।" इस तरह मांस को मांसत्व कहा जाता है, जैसा कि विद्वानों ने बताया है। श्रीमद् भागवत में जानवरों को मारने वालों के इस भयानक भाग्य का वर्णन नारद मुनि ने राजा प्राचीनाभर्हि को किया था, जो तथाकथित यज्ञों में जानवरों की बलि चढ़ाते थे।

भो भोः प्रजापते राजन्

पशून पश्य त्वयाध्वरे

संज्ञापितान् जीव-संघān

निर्घृणेन सहस्रशः

एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते

स्मरन्तो वैशसं तव

संपा तें अयः-कूटैश

छिन्दन्त्युत्थिता-मन्यवः

"हे प्रजाजनों के राजा, मेरे प्रिय राजन, आकाश में उन जानवरों को देखिए जिन्हें आपने बलिदान में बिना किसी दया या रहम के मारा है। वे सब जानवर आपकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिससे वे आप पर हुए अत्याचारों का बदला ले सकें। आपकी मृत्यु के बाद ये जानवर लोहे के सींगों से आपके शरीर को भेद देंगे।" (भागवत 4.25.7-8) जानवरों को मारने वालों की ऐसी सज़ा यमराज के न्यायक्षेत्र यानि मौत के देवता के ग्रह पर हो सकती है। दूसरे शब्दों में, हर वो व्यक्ति जो किसी जानवर को मारता है या मांस खाता है, वह निस्संदेह उस जीव पर कर्ज़दार हो जाता है जिसने मांस खाने वालों के चैन के लिए अपना शरीर दे दिया। मांस खाने वाले को अपनी कर्ज़दारी उतारनी होती है अपने शरीर को अगले जीवन में उसे खाने के लिए दे कर। ऐसे में कर्ज़ चुकाने के लिए अपने शरीर को खाने के लिए देना वैदिक साहित्य में बताया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)