मां स भक्षयितामुत्र
यस्य मांसमिहाद्यहम
एतन्मं सस्य मांसत्वं
प्रवदन्ति मनीषिणः
"इस प्राणी जिसका मांस मैं अभी खा रहा हूँ, वह मुझे अगले जीवन में खाएगा।" इस तरह मांस को मांसत्व कहा जाता है, जैसा कि विद्वानों ने बताया है। श्रीमद् भागवत में जानवरों को मारने वालों के इस भयानक भाग्य का वर्णन नारद मुनि ने राजा प्राचीनाभर्हि को किया था, जो तथाकथित यज्ञों में जानवरों की बलि चढ़ाते थे।
भो भोः प्रजापते राजन्
पशून पश्य त्वयाध्वरे
संज्ञापितान् जीव-संघān
निर्घृणेन सहस्रशः
एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते
स्मरन्तो वैशसं तव
संपा तें अयः-कूटैश
छिन्दन्त्युत्थिता-मन्यवः
"हे प्रजाजनों के राजा, मेरे प्रिय राजन, आकाश में उन जानवरों को देखिए जिन्हें आपने बलिदान में बिना किसी दया या रहम के मारा है। वे सब जानवर आपकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिससे वे आप पर हुए अत्याचारों का बदला ले सकें। आपकी मृत्यु के बाद ये जानवर लोहे के सींगों से आपके शरीर को भेद देंगे।" (भागवत 4.25.7-8) जानवरों को मारने वालों की ऐसी सज़ा यमराज के न्यायक्षेत्र यानि मौत के देवता के ग्रह पर हो सकती है। दूसरे शब्दों में, हर वो व्यक्ति जो किसी जानवर को मारता है या मांस खाता है, वह निस्संदेह उस जीव पर कर्ज़दार हो जाता है जिसने मांस खाने वालों के चैन के लिए अपना शरीर दे दिया। मांस खाने वाले को अपनी कर्ज़दारी उतारनी होती है अपने शरीर को अगले जीवन में उसे खाने के लिए दे कर। ऐसे में कर्ज़ चुकाने के लिए अपने शरीर को खाने के लिए देना वैदिक साहित्य में बताया गया है।
