यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि यद्यपि इस श्लोक में जुनून के भौतिक तरीके से सृष्टि और अज्ञानता के भौतिक तरीके से विनाश का उल्लेख है, लेकिन यह अच्छाई के भौतिक तरीके से विष्णु के रखरखाव का उल्लेख नहीं करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि विष्णु विशुद्ध-सत्त्व है, या असीमित पारलौकिक अच्छाई के मंच पर विद्यमान है। यद्यपि भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा प्रकृति के तरीकों के अधीक्षकों के रूप में अपने निर्धारित कर्तव्यों से कुछ प्रभावित हैं, भगवान विष्णु विशुद्ध-सत्त्व हैं, जो अच्छाई के भौतिक तरीके से भी पूरी तरह से परे हैं। जैसा कि वेदों में वर्णित है, ना तस्या कार्यं करणं च विद्यते: प्रभु का कोई व्यावसायिक कर्तव्य नहीं है। जबकि भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा को प्रभु का सेवक माना जाता है, विष्णु स्वयं परम प्रभु है।
श्रील जीवा गोस्वामी के अनुसार, इस श्लोक में विष्णु का वर्णन क्रतु-पतिः के रूप में किया गया है, जो बलिदान का स्वामी है, पिछले युग में प्रजापति रुचि के पुत्र सुयज्ञ अवतार के रूप में दिखाई दिए थे। जबकि ब्रह्मा और शिव परम प्रभु की सेवा में ईमानदारी से संलग्न होते हैं, विष्णु स्वयं परम प्रभु है, और इसलिए इस श्लोक (द्विज-धर्म-सेतुः) में वर्णित ब्राह्मणों और धार्मिक सिद्धांतों को बनाए रखने की उनकी गतिविधियाँ व्यावसायिक कर्तव्य नहीं बल्कि लीला हैं। इसलिए श्रील जीवा गोस्वामी के अनुसार, गुणावतार होने के अलावा, विष्णु भी लीलावतार हैं। महाभारत (शांति-पर्व) में विष्णु से निकलने वाले कमल के फूल से भगवान ब्रह्मा के जन्म और भगवान ब्रह्मा की क्रोधित आँखों से भगवान शिव के बाद के जन्म का वर्णन है। हालाँकि, विष्णु परमेश्वर का आत्म-प्रकट व्यक्तित्व है जो श्रीमद्-भागवतम (3.8.15) में बताए अनुसार अपनी आंतरिक शक्ति द्वारा भौतिक ब्रह्मांड में प्रवेश करता है:
तल लोका-पद्मं स उ एव विष्णुः
प्रावीविशत् सर्व-गुणावभासम
अंत में, भगवान विष्णु, भगवान का परम व्यक्तित्व, सर्वोच्च नियंत्रक हैं जिनका व्यक्तिगत रूप शाश्वत अस्तित्व, ज्ञान और आनंद से भरा है, जो अनादि हैं लेकिन हर चीज की शुरुआत हैं, जिन्हें गोविंद के रूप में जाना जाता है, और जो सभी कारणों का मूल कारण है, जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है। फिर भी, वही शाश्वत प्रभु ब्रह्मा और शिव के रूप में स्वयं को प्रकट करता है, इस अर्थ में कि प्रधान नियंत्रक ब्रह्मा और शिव प्रभु की शक्ति और सर्वोच्च इच्छा को प्रकट करते हैं, हालांकि वे स्वयं सर्वोच्च नहीं हैं।
