श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 4: राजा निमि से द्रुमिल द्वारा ईश्वर के अवतारों का वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  11.4.5 
आदावभूच्छतधृती रजसास्य सर्गे
विष्णु: स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतु: ।
रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुष: स आद्य
इत्युद्भ‍वस्थितिलया: सततं प्रजासु ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
शुरू में मूल परम पुरुषोत्तम भगवान ने इस ब्रह्मांड की सृष्टि करने के लिए रजोगुण के सहारे ब्रह्मा का रूप प्रकट किया। ब्रह्मांड के पालन और संचालन के लिए भगवान ने विष्णु के रूप में अपना स्वरूप प्रकट किया, जो यज्ञ के मालिक हैं और दो बार जन्म लेने वाले ब्राह्मणों और उनके धार्मिक कर्तव्यों के रक्षक हैं। और जब ब्रह्मांड के अंत का समय आता है तो वही भगवान तमोगुण का उपयोग करके अपना रुद्र रूप प्रकट करते हैं। इस तरह से उत्पन्न किए गए जीव सृष्टि, पालन और विनाश की शक्तियों के हमेशा अधीन रहते हैं।
 
In the beginning, the original Purna Purushottam God manifested His form as Brahma through the mode of passion to create this universe. To maintain the universe, the Lord manifested His form as Vishnu, the lord of sacrifices and the protector of twice-born brahmanas and their religious duties. And when the universe has to be destroyed, the same God manifests His form as Rudra using the mode of ignorance. The living entities thus created are always subject to the powers of creation, sustenance and destruction.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में परमेश्वर को आदी-कर्ता के रूप में वर्णित किया गया था, जो भौतिक दुनिया के निर्माण, रखरखाव और विनाश के लिए जिम्मेदार मूल व्यक्ति है। श्रीधर स्वामी के अनुसार, आदी-कर्ता या "मूल कर्ता" का अर्थ है कि बाद में रचनाकार, रखरखाव करने वाले और विध्वंसक हुए। अन्यथा आदि या "मूल" शब्द का कोई अर्थ नहीं होगा। इसलिए यह श्लोक वर्णन करता है कि परम सत्य गुणावतारों में अपना विस्तार करता है, या पृथ्वी पर अवतार लेता है जो क्रमशः जुनून, अच्छाई और अज्ञानता के तरीकों से ब्रह्मांड का निर्माण, रखरखाव और विनाश करते हैं।

यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि यद्यपि इस श्लोक में जुनून के भौतिक तरीके से सृष्टि और अज्ञानता के भौतिक तरीके से विनाश का उल्लेख है, लेकिन यह अच्छाई के भौतिक तरीके से विष्णु के रखरखाव का उल्लेख नहीं करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि विष्णु विशुद्ध-सत्त्व है, या असीमित पारलौकिक अच्छाई के मंच पर विद्यमान है। यद्यपि भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा प्रकृति के तरीकों के अधीक्षकों के रूप में अपने निर्धारित कर्तव्यों से कुछ प्रभावित हैं, भगवान विष्णु विशुद्ध-सत्त्व हैं, जो अच्छाई के भौतिक तरीके से भी पूरी तरह से परे हैं। जैसा कि वेदों में वर्णित है, ना तस्या कार्यं करणं च विद्यते: प्रभु का कोई व्यावसायिक कर्तव्य नहीं है। जबकि भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा को प्रभु का सेवक माना जाता है, विष्णु स्वयं परम प्रभु है।

श्रील जीवा गोस्वामी के अनुसार, इस श्लोक में विष्णु का वर्णन क्रतु-पतिः के रूप में किया गया है, जो बलिदान का स्वामी है, पिछले युग में प्रजापति रुचि के पुत्र सुयज्ञ अवतार के रूप में दिखाई दिए थे। जबकि ब्रह्मा और शिव परम प्रभु की सेवा में ईमानदारी से संलग्न होते हैं, विष्णु स्वयं परम प्रभु है, और इसलिए इस श्लोक (द्विज-धर्म-सेतुः) में वर्णित ब्राह्मणों और धार्मिक सिद्धांतों को बनाए रखने की उनकी गतिविधियाँ व्यावसायिक कर्तव्य नहीं बल्कि लीला हैं। इसलिए श्रील जीवा गोस्वामी के अनुसार, गुणावतार होने के अलावा, विष्णु भी लीलावतार हैं। महाभारत (शांति-पर्व) में विष्णु से निकलने वाले कमल के फूल से भगवान ब्रह्मा के जन्म और भगवान ब्रह्मा की क्रोधित आँखों से भगवान शिव के बाद के जन्म का वर्णन है। हालाँकि, विष्णु परमेश्वर का आत्म-प्रकट व्यक्तित्व है जो श्रीमद्-भागवतम (3.8.15) में बताए अनुसार अपनी आंतरिक शक्ति द्वारा भौतिक ब्रह्मांड में प्रवेश करता है:

तल लोका-पद्मं स उ एव विष्णुः

प्रावीविशत् सर्व-गुणावभासम

अंत में, भगवान विष्णु, भगवान का परम व्यक्तित्व, सर्वोच्च नियंत्रक हैं जिनका व्यक्तिगत रूप शाश्वत अस्तित्व, ज्ञान और आनंद से भरा है, जो अनादि हैं लेकिन हर चीज की शुरुआत हैं, जिन्हें गोविंद के रूप में जाना जाता है, और जो सभी कारणों का मूल कारण है, जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है। फिर भी, वही शाश्वत प्रभु ब्रह्मा और शिव के रूप में स्वयं को प्रकट करता है, इस अर्थ में कि प्रधान नियंत्रक ब्रह्मा और शिव प्रभु की शक्ति और सर्वोच्च इच्छा को प्रकट करते हैं, हालांकि वे स्वयं सर्वोच्च नहीं हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)