श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 4: राजा निमि से द्रुमिल द्वारा ईश्वर के अवतारों का वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  11.4.3 
भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टै:
पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् ।
स्वांशेन विष्ट: पुरुषाभिधान-
मवाप नारायण आदिदेव: ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
जब आदि भगवान नारायण ने अपने अंगों से उत्पन्न पाँच तत्त्वों से अपना सर्वकालिक शरीर सृजित किया और तत्पश्चात अपने पूर्णांश से उस सर्वकालिक शरीर में प्रवेश किया, तो वे पुरुष नाम से विख्यात हुए।
 
When the original Lord Narayana created his gigantic body from the five elements that originated from himself and then entered that gigantic body with his own part, he became known as Purusha.
तात्पर्य
इस श्लोक में भूतै: पंचभि: शब्द पाँच स्थूल भौतिक तत्वों को इंगित करते है - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - जो भौतिक जगत के बुनियादी घटक है। जब बद्ध जीव इन पांच तत्वों के दायरे में आता है, चेतना के साथ-साथ मन और बुद्धि के कार्य भी प्रकट हो जाते हैं। दुर्भाग्य से, प्रकृति के भौतिक तौर तरीकों के अधीन प्रकट चेतना अहंकार या मिथ्या अहंकार द्वारा शासित होती है, जिसमें जीव गलत तरीके से खुद को भौतिक तत्वों का भोक्ता मानता है। यद्यपि भगवान का परम व्यक्तित्व, पुरूषोत्तम, आध्यात्मिक आकाश में अपने विशुद्ध अलौकिक अस्तित्व का आनंद लेता है, भौतिक तत्व भी उसके आनंद के लिए ही हैं, यज्ञ या बलिदान की प्रक्रिया के माध्यम से। इस भौतिक जगत को देवी-धाम, या भगवान की भ्रामक ऊर्जा, मायादेवी का निवास कहा जाता है। ब्रह्म-संहिता बताती है कि परम व्यक्तित्व अपनी निम्न ऊर्जा, माया से बिल्कुल भी आकर्षित नहीं होता है, लेकिन जब भौतिक सृजन भगवान की भक्तिमय सेवा में उपयोग किया जाता है, भगवान जीवों की भक्ति और बलिदान से आकर्षित हो जाते हैं, और इस प्रकार, अप्रत्यक्ष रूप से, वह भी भौतिक जगत के भोक्ता हैं।

हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि इस ब्रह्मांड के अधिआत्मा और निर्माता के रूप में भगवान नारायण का कालक्षेप आध्यात्मिक जगत में नारायण के शाश्वत कालक्षेपों की तुलना में निम्न स्तर का है। क्या भगवान नारायण भौतिक सृजन के अपने कार्यों में अपने अलौकिक आनंद और ज्ञान को कम करने जा रहे हैं, उन्हें एक बद्ध आत्मा वाला माना जाएगा, जो भ्रामक शक्ति के सम्पर्क से प्रभावित होती है। लेकिन चूंकि भगवान नारायण माया के प्रभाव से शाश्वत रूप से दूर हैं, इस ब्रह्मांड के अधिआत्मा के रूप में उनके कार्य आध्यात्मिक जगत में उनके कार्यों के समान ही अलौकिक स्तर पर हैं। भगवान के व्यक्तित्व के सभी कार्य उनके असीमित आध्यात्मिक कालक्षेपों का हिस्सा और पार्सल हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)