श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 4: राजा निमि से द्रुमिल द्वारा ईश्वर के अवतारों का वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  11.4.2 
श्रीद्रुमिल उवाच
यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ता-
ननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धि: ।
रजांसि भूमेर्गणयेत् कथञ्चित्
कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्न: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
श्री द्रुमिल ने कहा: अनंत भगवान के अनंत गुणों को समझाने या गिनने का प्रयास करने वाले की बुद्धि मूर्ख बच्चे जैसी होती है। भले ही एक महान प्रतिभाशाली व्यक्ति पृथ्वी की सतह पर धूल के कणों को किसी तरह गिनने के लिए बहुत समय खर्च कर ले, वह भगवान के आकर्षक गुणों को कभी नहीं गिन सकता, क्योंकि भगवान सभी शक्तियों के भंडार हैं।
 
Sri Drumil said: The intelligence of a person who tries to describe or count the infinite qualities of the infinite Lord is like that of a foolish child. Even if a person of great talent somehow manages to count the dust particles on the surface of the earth, such a person cannot count the attractive qualities of the Lord, because the Lord is the repository of all energies.
तात्पर्य
राजा निमि के निवेदन पर कि नव-योगेन्द्र भगवान के सभी गुणों और लीलाओं का वर्णन करें। यहाँ श्री ड्रुमिला बताते हैं कि केवल अत्यंत मूर्ख व्यक्ति ही भगवान के असीम गुणों और लीलाओं का विस्तृत वर्णन करने का प्रयास करेगा। हालाँकि ऐसे मूर्ख और बच्चों जैसे लोग अज्ञानी भौतिकवादी वैज्ञानिकों से कहीं अधिक उन्नत होते हैं, जो वास्तव में भगवान का उल्लेख किए बिना सभी ज्ञान का वर्णन करने का प्रयास करते हैं। दूसरे शब्दों में, हालाँकि भगवान का पूर्णता से वर्णन करना असंभव है, फिर भी मूर्ख और आस्तिक वैज्ञानिक भगवान के प्रारंभिक ज्ञान तक भी पहुँचे बिना सभी ज्ञान का वर्णन करने का प्रयास करते हैं। ऐसे आस्तिक लोगों को अदूरदर्शी और बहुत कम बुद्धि वाले समझना चाहिए, भले ही उनकी दिखावटी भौतिक उपलब्धियाँ हों, जो अंततः महान दुख और विनाश में समाप्त होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि स्वयं भगवान अनंतदेव अपनी असंख्य जीभों से भी भगवान के गौरव का पूर्णता से वर्णन नहीं कर सकते। इस श्लोक में दिया गया उदाहरण बहुत अच्छा है। कोई भी मनुष्य पृथ्वी की सतह पर कणों की संख्या की गणना करने की आशा नहीं कर सकता; इसलिए किसी को भी अपने स्वयं के छोटे से प्रयास से सर्वोच्च भगवान को समझने की मूर्खता नहीं करनी चाहिए। भगवद गीता में भगवान द्वारा बोले गए अनुसार ईश्वर के ज्ञान को विनम्रता से सुनना चाहिए और इस तरह धीरे-धीरे श्रीमद्-भागवतम सुनने के स्तर तक पहुँचा जाना चाहिए। चैतन्य महाप्रभु के अनुसार, समुद्र के पानी की एक बूंद का स्वाद लेकर कोई भी पूरे समुद्र के स्वाद का अंदाजा लगा सकता है। इसी तरह, भगवान के बारे में विनम्रता से सुनने से कोई भी परम सत्य के गुणात्मक ज्ञान को प्राप्त कर सकता है, हालाँकि मात्रात्मक रूप से किसी का ज्ञान कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)