देवता यहाँ कहते हैं, "हमने सोचा, हमारे प्रिय भगवान, हम तुम्हारी चेतना को हमारी मूर्खतापूर्ण चालों से परेशान कर सकते हैं। लेकिन तुम्हारी दया से तुम्हारे भक्त भी हमारी थोड़ी परवाह करते हैं, तो तुम हमारे मूर्खतापूर्ण व्यवहार को गंभीरता से क्यों लो? " यहाँ यदी शब्द का प्रयोग इस निश्चितता को इंगित करने के लिए किया गया है कि कृष्ण हमेशा अपने समर्पित भक्तों के रक्षक हैं। यद्यपि निष्ठावान भक्त के मार्ग में कई बाधाएं हो सकती हैं जो भगवान की महिमा का प्रचार कर रहा है, ऐसी बाधाएं भक्त के दृढ़ संकल्प को बढ़ाती हैं। इसलिए, श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, देवताओं द्वारा प्रस्तुत निरंतर बाधाएं एक प्रकार की सीढ़ी या सीढ़ी बनाती हैं जिस पर भक्त लगातार ईश्वर के राज्य में वापस प्रगति करता है। एक समान श्लोक श्रीमद-भागवतम (10.2.33) में प्रकट होता है:
तथा न ते माधव तावका क्वचिद
भ्रश्यन्ति मार्गात त्वयि बद्ध-सौहृदा
त्वयभिगुप्ता विचरंति निर्भया
विनायकानीकप-मूर्धसु प्रभो
"हे माधव, भगवान के परम व्यक्तित्व, भाग्य की देवी के स्वामी, यदि आपसे पूरी तरह से प्रेम करने वाले भक्त कभी भक्ति के मार्ग से भटक जाते हैं, तो वे अधर्मी की तरह नहीं गिरते, क्योंकि आप अभी भी उनकी रक्षा करते हैं। इस प्रकार वे अपने विरोधियों के सिर पर निर्भय होकर भक्ति सेवा में प्रगति करते रहते हैं। "
