श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 4: राजा निमि से द्रुमिल द्वारा ईश्वर के अवतारों का वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  11.4.10 
त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तराया:
स्वौको विलङ्‍घ्य परमं व्रजतां पदं ते ।
नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददत: स्वभागान्
धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
देवताओं द्वारा प्रस्तुत की गई बाधाओं के कारण, उन लोगों के लिए जो आपके अस्थायी निवासों के पार जाकर आपके सर्वोच्च निवास तक पहुंचने की आकांक्षा रखते हैं, कई बाधाएं आती हैं। ऐसे लोग जो बलि के समारोहों में देवताओं को अपना नियत हिस्सा देते हैं, उन्हें ऐसी कोई बाधा नहीं आती है। लेकिन चूंकि आप अपने भक्त के प्रत्यक्ष रक्षक हैं, इसलिए वह उन सभी बाधाओं से पार पाने में सक्षम है जो देवता उसके सामने रखते हैं।
 
The demigods place many obstacles in the path of those who worship You in order to cross the temporary abodes of the demigods and reach Your supreme abode. Those who offer the demigods their due share in sacrifices face no such obstacles. But because You are the direct protector of Your devotee, he is able to cross all the obstacles placed before him by the demigods.
तात्पर्य
कामदेव, या काम, के नेतृत्व में देवताओं ने भगवान नर-नारायण ऋषि के चरणों में अपने अपराध को स्वीकार करते हुए सर्वोच्च भगवान के संबंध में देवताओं की तुच्छ स्थिति को इंगित किया है। जिस प्रकार एक किसान को अपने कृषि लाभ का एक निश्चित प्रतिशत राजा या राजनीतिक प्रमुख को कर के रूप में देना पड़ता है, उसी प्रकार सभी मनुष्यों को अपनी भौतिक संपत्ति का एक प्रतिशत यज्ञ में देवताओं को अर्पित करना चाहिए। हालाँकि, भगवद-गीता में, भगवान बताते हैं कि देवता भी उनके सेवक हैं और वे स्वयं हैं जो देवताओं की एजेंसी के माध्यम से सभी लाभ प्रदान करते हैं। मायाइवा विहितान हि तन। यद्यपि एक वैष्णव, या भगवान का भक्त, को देवताओं की पूजा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, देवता, अपनी उच्च भौतिक स्थिति के गर्व में होते हुए, कभी-कभी भगवान के प्रति वैष्णव की विशिष्ट भक्ति का विरोध करते हैं और इस प्रकार भक्त को पतन करने का प्रयास करते हैं, जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है (सुर-कृत बहवोऽन्तरायः)। लेकिन यहां देवता बताते हैं कि कृष्ण सीधे अपने भक्तों के रक्षक हैं। इसलिए, कथित बाधाएं एक निष्ठावान भक्त के लिए और अधिक आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रोत्साहन बन जाती हैं।

देवता यहाँ कहते हैं, "हमने सोचा, हमारे प्रिय भगवान, हम तुम्हारी चेतना को हमारी मूर्खतापूर्ण चालों से परेशान कर सकते हैं। लेकिन तुम्हारी दया से तुम्हारे भक्त भी हमारी थोड़ी परवाह करते हैं, तो तुम हमारे मूर्खतापूर्ण व्यवहार को गंभीरता से क्यों लो? " यहाँ यदी शब्द का प्रयोग इस निश्चितता को इंगित करने के लिए किया गया है कि कृष्ण हमेशा अपने समर्पित भक्तों के रक्षक हैं। यद्यपि निष्ठावान भक्त के मार्ग में कई बाधाएं हो सकती हैं जो भगवान की महिमा का प्रचार कर रहा है, ऐसी बाधाएं भक्त के दृढ़ संकल्प को बढ़ाती हैं। इसलिए, श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, देवताओं द्वारा प्रस्तुत निरंतर बाधाएं एक प्रकार की सीढ़ी या सीढ़ी बनाती हैं जिस पर भक्त लगातार ईश्वर के राज्य में वापस प्रगति करता है। एक समान श्लोक श्रीमद-भागवतम (10.2.33) में प्रकट होता है:

तथा न ते माधव तावका क्वचिद

भ्रश्यन्ति मार्गात त्वयि बद्ध-सौहृदा

त्वयभिगुप्ता विचरंति निर्भया

विनायकानीकप-मूर्धसु प्रभो

"हे माधव, भगवान के परम व्यक्तित्व, भाग्य की देवी के स्वामी, यदि आपसे पूरी तरह से प्रेम करने वाले भक्त कभी भक्ति के मार्ग से भटक जाते हैं, तो वे अधर्मी की तरह नहीं गिरते, क्योंकि आप अभी भी उनकी रक्षा करते हैं। इस प्रकार वे अपने विरोधियों के सिर पर निर्भय होकर भक्ति सेवा में प्रगति करते रहते हैं। "

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)