श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 4: राजा निमि से द्रुमिल द्वारा ईश्वर के अवतारों का वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  11.4.1 
श्रीराजोवाच
यानि यानीह कर्माणि यैर्यै: स्वच्छन्दजन्मभि: ।
चक्रे करोति कर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तु न: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
राजा निमि ने कहा: भगवान् अपनी आन्तरिक शक्ति से और अपनी इच्छानुसार भौतिक संसार में अवतार लेते हैं। इसलिए, आप हमें भगवान् हरि की उन विभिन्न लीलाओं के बारे में बताएं, जिन्हें उन्होंने अतीत में पूरा किया, वर्तमान में कर रहे हैं और आने वाले समय में अपने विभिन्न अवतारों में पूरी करेंगे।
 
King Nimi said: The Lord descends into the material world by His internal potency and at His will. Therefore, please tell us about the various pastimes of Lord Hari which He has performed in the past, is performing at present and will perform in the future in His various incarnations.
तात्पर्य
इस चौथे अध्याय में जयन्ती के पुत्र, द्रुमिल, राजा निमि को संबोधित करेंगे। तीसरे अध्याय के चालीसवें श्लोक में कहा गया है, मूर्त्यभिमतयतः: "व्यक्ति को उस ईश्वर के उस विशेष रूप की पूजा करनी चाहिए जो सबसे अधिक आकर्षक होता है। "इसी तरह पिछले अध्याय में कहा गया था, स्तवैः स्तुत्वा नाम धरिम: "प्रार्थनाओं से उसका गुणगान करने के बाद हरि भगवान को प्रणाम करना चाहिए। "इस प्रकार यह माना जाता है कि पूजक को पूजा की उस प्रक्रिया को निष्पादित करने के लिए सर्वोच्च भगवान के पारलौकिक गुणों और लीलाओं का ज्ञान है जिसका पहले वर्णन किया गया था। इसलिए, राजा निमि, सर्वोच्च भगवान के विभिन्न अवतारों के बारे में उत्सुकता से पूछताछ कर रहे हैं ताकि वह यह पता लगा सकें कि सर्वोच्च भगवान का कौन सा विशेष रूप उनकी व्यक्तिगत पूजा के लिए सबसे उपयुक्त है। यह समझा जाता है कि राजा निमि एक वैष्णव या भक्त हैं, जो ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व की कृपा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। इस संबंध में यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अभिमत-मूर्ति शब्द, जिसका अर्थ है "किसी का सबसे वांछनीय रूप, "यह इंगित नहीं करता है कि व्यक्ति अपनी इच्छा से भगवान का एक रूप गढ़ सकता है। अद्वैतम अच्युतम अनादिम अनंत-रूपम। सर्वोच्च भगवान के सभी रूप अनादिम या शाश्वत हैं। इस प्रकार किसी रूप को गढ़ने का कोई प्रश्न नहीं है, क्योंकि ऐसा आविष्कार आदि होगा, या गढ़े हुए रूप की उत्पत्ति। अभिमतमूर्ति का अर्थ है कि भगवान के शाश्वत रूपों में से किसी को उस रूप का चयन करना चाहिए जो ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के लिए सबसे अधिक प्रेरित करता है। इस तरह के प्यार की नकल नहीं की जा सकती है, लेकिन जब कोई सद्गुरु द्वारा दिए गए निर्धारित नियमों और विनियमों का पालन करता है तो यह स्वचालित रूप से जागृत होता है और श्रीमद्-भागवतम के इन विवरणों को नम्रता से सुनता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)