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bhagavat 11.31.2-3: भगवान के प्रस्थान के साक्षी बनने के लिए चारण, यक्ष, राक्षस, किन्नर, अप्सराएँ और गरुड़ के रिश्तेदारों समेत पितर, सिद्ध, गंधर्व, विद्याधर और महान सर्प भी आए। आते समय, वे सभी विभिन्न तरीकों से भगवान शौरी (कृष्ण) के जन्म और कार्यों का गुणगान और महिमामंडन कर रहे थे।   |   bhagavat अध्याय 11.31: भगवान् श्रीकृष्ण का अंतर्धान होना   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 31: भगवान् श्रीकृष्ण का अंतर्धान होना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  11.31.2-3 
पितर: सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगा: ।
चारणा यक्षरक्षांसि किन्नराप्सरसो द्विजा: ॥ २ ॥
द्रष्टुकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुका: ।
गायन्तश्च गृणन्तश्च शौरे: कर्माणि जन्म च ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के प्रस्थान के साक्षी बनने के लिए चारण, यक्ष, राक्षस, किन्नर, अप्सराएँ और गरुड़ के रिश्तेदारों समेत पितर, सिद्ध, गंधर्व, विद्याधर और महान सर्प भी आए। आते समय, वे सभी विभिन्न तरीकों से भगवान शौरी (कृष्ण) के जन्म और कार्यों का गुणगान और महिमामंडन कर रहे थे।
 
Charanas, Yakshas, ​​Rakshasas, Kinnaras, Apsaras, Garuda's relatives, Pitriganas, Siddhas, Gandharvas, Vidyadharas and big serpents also came to see the Lord's departure. While coming, all those persons were singing and glorifying the birth and deeds of Lord Shauri (Krishna) in various ways.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)