श्रीभगवानुवाच
एते घोरा महोत्पाता द्वार्वत्यां यमकेतव: ।
मुहूर्तमपि न स्थेयमत्र नो यदुपुङ्गवा: ॥ ५ ॥
अनुवाद
भगवान ने कहा: हे यदुवंश के नेताओं, ज़रा इन भयावह अपशकुनों पर गौर करो जो द्वारका में मौत के झंडों की तरह दिखाई दे रहे हैं। हमें यहाँ पर और एक पल भी नहीं रुकना चाहिए।
The Lord said: O leaders of the Yadu dynasty, please pay attention to all these terrible omens that have appeared like flags of death in Dwaraka. Now we should not stop here even for a moment.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने वैदिक साहित्यों से अनेक प्रमाण दिए हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि भगवान के मानवरूप और उनका पवित्र नाम, धाम, सामग्री और सहचर सभी नित्य हैं, आध्यात्मिक रूप हैं जिसमें भौतिक दूषण का कोई अंश नहीं है। (परिशिष्ट देखें) इस संबंध में आचार्य ने आगे बताया है कि क्योंकि जीवों को अपनी पापपूर्ण गतिविधियों की प्रतिक्रिया भुगतनी चाहिए, भगवान उनके लिए कलयुग के दौरान दंड की व्यवस्था करते हैं। दूसरे शब्दों में, यह भगवान कृष्ण की इच्छा नहीं है कि बद्ध आत्माएँ पापी हों और दुख भोगें, लेकिन क्योंकि वे पहले से ही पापी हैं, भगवान एक उपयुक्त युग बनाते हैं जिसके दौरान वे अधार्मिकता के कड़वे फलों का अनुभव कर सकते हैं। चूँकि भगवान कृष्ण इस भौतिक जगत में अपने विभिन्न अवतारों में व्यक्तिगत रूप से धार्मिक सिद्धांतों को स्थापित करते हैं, द्वापर-युग के अंत में पृथ्वी पर धर्म अत्यधिक शक्तिशाली था। सभी महत्वपूर्ण राक्षस मारे जा चुके थे; महान ऋषियों, संतों और भक्तों को बहुत अधिक प्रोत्साहित, प्रबुद्ध और दृढ़ किया गया था; और अधर्म के लिए बहुत कम गुंजाइश थी। यदि भगवान कृष्ण दुनिया की नजरों के सामने अपने आध्यात्मिक शरीर में आध्यात्मिक आकाश की ओर जाते, तो कलियुग का फलना-फूलना बहुत कठिन हो जाता। भगवान कृष्ण ने रामचंद्र के रूप में अपने अवतार के दौरान दुनिया को ठीक उसी तरह छोड़ा था, और सैकड़ों हजारों वर्षों बाद भी, सैकड़ों लाखों पवित्र व्यक्ति अभी भी भगवान के इस अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। हालांकि, कलियुग का मार्ग प्रशस्त करने के लिए, भगवान कृष्ण ने इस संसार को इस तरह छोड़ा कि जिन लोगों ने दृढ़तापूर्वक उनका भक्ति नहीं की है, वे हैरान रह जाते हैं। भगवान के नित्य रूप का वर्णन पूरे वैदिक साहित्य में किया गया है, और उनका नित्य रूप सभी महान आचार्यों के अनुसार परम सत्य की सर्वोच्च समझ है, जिसमें शंकराचार्य और चैतन्य महाप्रभु शामिल हैं। फिर भी यद्यपि भगवान कृष्ण का नित्य, आध्यात्मिक रूप उन्नत भक्तों के लिए एक साकार तथ्य है, जो लोग कृष्ण चेतना में कमजोर हैं, उनके लिए भगवान के अकल्पनीय लीला और योजना को कभी-कभी ठीक से समझना मुश्किल होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥