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bhagavat 11.30.43: दारुक ने कहा : जैसे चंद्रविहीन रात में लोग अँधेरे में खो जाते हैं और अपना रास्ता नहीं ढूंढ पाते, हे प्रभु, अब जब मैंने आपके कमल चरणों का दर्शन खो दिया है, तो मैं अपनी दृष्टि खो चुका हूँ और अंधेरे में अंधे की तरह भटक रहा हूँ। मैं अपनी दिशा नहीं जान सकता, न ही मुझे कहीं कोई शांति मिल रही है।   |   bhagavat अध्याय 11.30: यदुवंश का संहार   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 30: यदुवंश का संहार  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  11.30.43 
अपश्यतस्त्वच्चरणाम्बुजं प्रभो
द‍ृष्टि: प्रणष्टा तमसि प्रविष्टा ।
दिशो न जाने न लभे च शान्तिं
यथा निशायामुडुपे प्रणष्टे ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
दारुक ने कहा : जैसे चंद्रविहीन रात में लोग अँधेरे में खो जाते हैं और अपना रास्ता नहीं ढूंढ पाते, हे प्रभु, अब जब मैंने आपके कमल चरणों का दर्शन खो दिया है, तो मैं अपनी दृष्टि खो चुका हूँ और अंधेरे में अंधे की तरह भटक रहा हूँ। मैं अपनी दिशा नहीं जान सकता, न ही मुझे कहीं कोई शांति मिल रही है।
 
Daruk said: Just as people get lost in darkness on a moonless night and cannot find their way, O Lord, now I cannot see your feet, I have lost my sight and am wandering in darkness like a blind man. Neither can I tell my direction nor can I find any peace anywhere.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)