श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 30: यदुवंश का संहार  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  11.30.42 
तं तत्र तिग्मद्युभिरायुधैर्वृतं
ह्यश्वत्थमूले कृतकेतनं पतिम् ।
स्‍नेहप्लुतात्मा निपपात पादयो
रथादवप्लुत्य सबाष्पलोचन: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
बरगद के वृक्ष के नीचे आराम करते और उनके चारों ओर चमचमाते हथियारों से घिरे भगवान् कृष्ण को देखकर दारुक अपने हृदय में समाए स्नेह को रोक न सका। जैसे ही वह रथ से उतरा, उसकी आँखों में आँसू भर आए और वह भगवान् के चरणों पर गिर पड़ा।
 
Seeing Lord Krishna resting at the root of the banyan tree and surrounded by His glittering weapons, Daruka could not hold back the affection he had in his heart. As soon as he got down from the chariot, his eyes filled with tears and he fell at the Lord's feet.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)