ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभ: ।
प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत् ॥ २ ॥
अनुवाद
ब्राह्मणों के शाप से अपने वंश के विनाश के बाद, यदुओं में सर्वश्रेष्ठ भगवान ने अपनी देह का त्याग किस प्रकार किया, जो सभी नेत्रों की परमप्रिय वस्तु थी?
How did the Lord, the best of the Yadus, give up His body, which was the most beloved object of all eyes, after His own dynasty had been destroyed by the curse of the brahmanas?
तात्पर्य
इस श्लोक के संबध में श्रील जीव गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान् कभी भी अपने आध्यात्मिक शरीर का त्याग नहीं करते। उनका शरीर शाश्वत, आनंद और ज्ञान से परिपूर्ण है। इसलिए "कथम्" शब्द "कैसे संभव है" का अर्थ देता है। इसके अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण के लिए अपने शाश्वत रूप, जो "प्रेयसीं सर्व-नेत्राणां" है, अर्थात् आँखों और बाकी सब इंद्रियों के लिए सबसे अधिक आकर्षक वस्तु है, का त्याग करना बिलकुल भी असंभव है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥