श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 30: यदुवंश का संहार  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  11.30.12 
ततस्तस्मिन् महापानं पपुर्मैरेयकं मधु ।
दिष्टविभ्रंशितधियो यद्‌द्रवैर्भ्रश्यते मति: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
तब दैव द्वारा बुद्धि भ्रष्ट किये गये वे सब खुले मन से मधुर मैरेय पेय के पीने में लग गये जो मन को पूरी तरह मदोन्मत्त करने वाला है।
 
Then all of them, whose minds were corrupted by the God, started drinking with open mind the sweet nectarine drink which completely intoxicates the mind.
तात्पर्य
यहाँ 'दिष्ट:' शब्द भगवान के इच्छा को दर्शाता है। इस सर्ग के प्रथम अध्याय 'यदु वंश पर शाप' इस घटना की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की गयी है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)