श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  11.3.8 
धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् ।
अनादिनिधन: कालो ह्यव्यक्तायापकर्षति ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
जब भौतिक तत्त्वों का विनाश होने वाला होता है, तो भगवान्, जो शाश्वत समय के रूप में हैं, स्थूल और सूक्ष्म रूपों वाले प्रकट ब्रह्मांड को अपने में लीन कर लेते हैं और पूरा ब्रह्मांड अदृश्य हो जाता है।
 
When the destruction of the material elements is near, the Lord in the form of time gathers the manifested world of gross and subtle qualities and the entire universe disappears in the unmanifested form.
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम के तीसरे काण्ड में भगवान कपिलदेव ने शिक्षा दी है कि भौतिक प्रकृति शुरू में प्रधान नामक संतुलन की निष्क्रिय स्थिति में मौजूद है। जब भगवान विष्णु काल या समय के रूप में अपनी शक्तिशाली दृष्टि डालते हैं, तो भौतिक संपर्क होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भौतिक ब्रह्मांड का विविधरंगी निर्माण होता है। इस कविता में कहा गया है कि सार्वभौमिक समय के अंत में वही काल जो मूल रूप से प्रकटीकरण में महिला प्रकृति को उकसाता है, ब्रह्मांड को फिर से निष्क्रिय अप्रकटीकरण की अपनी मूल स्थिति में वापस ले लेता है। श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर के अनुसार, समय की क्षमता ही, काल, तब वापस ले ली जाती है, और यह सर्वोच्च आत्मा में विलीन हो जाती है, जो भौतिक प्रकृति (अनादि आदि गोविंदः सर्व-कारण-कारणम्) के मूल कारण के रूप में खुद को प्रकट करती है।

निर्माण और विनाश, जन्म और मृत्यु के लिए इस तरह की तकनीकी व्यवस्था भगवान के शाश्वत आध्यात्मिक राज्य में मौजूद नहीं है। आध्यात्मिक आकाश में भगवान और उनके भक्तों का विविध आध्यात्मिक आनंद भौतिक दुनिया में पाए जाने वाले जन्म, रखरखाव और विनाश के निम्न चक्रों से बाधित नहीं होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)