न भवेद् ग्राह्यम इंद्रियैः |
सेवन मुखे हि जिह्वादौ
स्वयं एव स्फुरत्यद: ||
(पद्म पुराण)
परम सत्य को सामान्य भौतिक इंद्रियों द्वारा कभी नहीं समझा जा सकता है। भौतिक इंद्रियों की तृप्ति के पीछे भागने वाले बद्ध जीव प्रभु की भक्तियुक्त अतिंद्रीय सेवा में पूर्णतः उदासीन रहते हैं। उनके भौतिक रूप से बद्ध मन हमेशा अशुद्ध और भौतिक द्वंद्वों की अंतहीन धारा, जैसे समृद्धि और गरीबी, सर्दी और गर्मी, ख्याति और बदनामी, यौवन और वृद्धावस्था से परेशान रहते हैं। ऐसी परेशान और बद्ध आत्माएं मूर्ति के रूप में परम सत्य की व्यक्तिगत उपस्थिति को नहीं पहचान सकती हैं।
मूर्ति के रूप में प्रभु का अवतार अर्चा-अवतार भौतिकवादी या नवोन्मेषी भक्तों के प्रति प्रभु की दया की एक विशेष अभिव्यक्ति है जो अभी भी भौतिक विलक्षणताओं के प्रभाव में हैं। वे प्रभु को उनके शाश्वत निवास में नहीं देख सकते हैं, और इसलिए प्रभु मूर्ति के रूप में अवतरित होते हैं, जो प्रकाशावतारों और यहां तक कि स्वयं-प्रकाश को भी प्रकट करते हैं, या प्रभु का मूल रूप है। प्रकाशावतार इस दुनिया के भीतर विभिन्न लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं, जबकि स्वयं-प्रकाश, प्रभु का मूल रूप, सभी अवतारों का स्रोत है।
जो मूर्ति की ईमानदारी से पूजा करता है, मूर्ति स्वयं को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में प्रकट करती है। जो सबसे दुर्भाग्यशाली हैं वे अपने दयालु मूर्ति विस्तार में सर्वोच्च भगवान को भी नहीं पहचान सकते हैं। वे देवता को एक साधारण भौतिक वस्तु मानते हैं। लेकिन एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के चरण कमलों में समर्पण करके, जो प्रभु का एक शुद्ध भक्त है, कोई भी इस छंद में वर्णित अनुसार देवता की पूजा करना सीख सकता है, और इस प्रकार प्रभु के साथ अपने खोए हुए संबंध को पुनर्जीवित कर सकता है। जो इस तरह की दिव्य देव पूजा को मूर्ति पूजा के बराबर मानता है, वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से मोटे तौर पर ढका हुआ है। गुलाबी रंग का चश्मा पहने व्यक्ति पूरी दुनिया को गुलाबी रंग का देखता है। इसी तरह, दुर्भाग्यपूर्ण जीवित संस्थाएँ जो प्रकृति के भौतिक तरीकों से मोटे तौर पर आच्छादित हैं, वे सर्वोच्च भगवान सहित सब कुछ को भौतिक दृष्टि से देखते हैं।
