''शरीरं यद वाप्नोति
यच्चाप्युत्क्रामतीश्वर:
ग्रहीतैतानि संयाति
वायुर्गन्धान इवाशयत्''
"भौतिक संसार में सजीव अपने जीवन की विभिन्न अवधारणाओं को एक शरीर से दूसरे शरीर में ले जाता है जैसे हवा सुगंधों को ले जाती है।" श्रील प्रभुपाद ने अपने भावार्थ में टिप्पणी की है, "यहाँ जीव को ईश्वरः, अपने शरीर का नियंत्रक के रूप में वर्णित किया गया है। यदि वह चाहे तो वह अपने शरीर को उच्च श्रेणी में बदल सकता है, और यदि चाहे तो वह निम्न श्रेणी में जा सकता है। सूक्ष्म स्वतंत्रता वहाँ है। उसके शरीर में होने वाला परिवर्तन उसके ऊपर निर्भर करता है।" यह कथन इस अध्याय के पाठ 3 में "स्व-मात्रा" और "आत्मा-प्रसिद्धये" शब्दों की पुष्टि करता है। यदि परम प्रभु जीव की सूक्ष्म स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने लगे, तो जीव के लिए प्रभु की प्रेममयी सेवा में शामिल होने का कोई प्रश्न ही नहीं रहेगा, क्योंकि प्रेम का तात्पर्य प्रेमी द्वारा एक स्वतःस्फूर्त मुक्त विकल्प है। यहाँ शब्द "प्रभुः" बताता है कि जैसे एक बच्चा, जो अपने पिता से एक खिलौना कार प्राप्त करता है, फुटपाथ पर पैडल मारता है, अपने पिता की नकल करता है, जो एक वास्तविक कार चलाता है, उसी तरह जीव भौतिक ब्रह्मांड में असंख्य भौतिक शरीरों में पैडल मारता है जो परम प्रभु द्वारा उसके लिए 8,400,000 प्रजातियों के वर्गीकरण में से चुने गए हैं। इस प्रकार, जीव, भौतिक शरीर के झूठे अहंकार से आसक्त होकर, एक भयावह स्थिति बनाता है जिसमें वह बार-बार जन्म और मृत्यु से गुजरता है, जैसा कि कथन "भयम् द्वितीयभिनिवेशत: स्यात्" (भाग। 11.2.37) में वर्णित है।
श्रील जीव गोस्वामी ने इस श्लोक की एक और व्याख्या दी है। यदि "प्रभुः" शब्द को परम प्रभु का अर्थ लेने के लिए लिया जाए, तो "गुणैः" शब्द को "अच्छे गुणों" के रूप में समझा जा सकता है, क्योंकि "गुण" प्रकृति के भौतिक प्रकारों या प्रशंसनीय गुणों को संदर्भित कर सकता है (जैसे श्लोक में "यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्य अकिंचना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः")। इस श्लोक का तात्पर्य यह होगा कि प्रभु, अपने पारलौकिक गुणों (गुणैः) जैसे दया द्वारा, अपने शुद्ध भक्तों के पारलौकिक गुणों (गुणान) का आनंद लेने में सक्षम हैं। "आत्म-प्रत्योदितैः" तब यह बताएगा कि प्रभु के प्रति समर्पण करने से, जो सभी अच्छे गुणों का भंडार है, शुद्ध भक्त भी इसी तरह दिव्य गुणों से संपन्न हो जाते हैं। "मन्यमान इदं सृष्टम आत्मानम्" शब्द बताते होंगे कि प्रभु अपने शुद्ध भक्त के शरीर को अपने स्वयं के आध्यात्मिक स्तर पर स्वीकार करते हैं, जैसा कि श्लोक "आचार्यम् माम् विजानीयान् नावामनिता कर्हिचित्" में इंगित किया गया है। प्रभु अपने शुद्ध भक्तों की प्रेममयी भक्ति सेवा से आकर्षित होते हैं और इस प्रकार उनके साथ अपने प्रेमपूर्ण संबंधों के जाल में उलझ जाते हैं। उदाहरण के लिए, कुरुक्षेत्र की लड़ाई के बाद, जब कृष्ण अपने शहर, द्वारका के लिए जा रहे थे, तो महाराजा युधिष्ठिर की प्रेममय अपील ने प्रभु को हस्तिनापुर में कई और हफ्तों तक रहने के लिए मजबूर किया। इसी तरह, जब वृंदावन की बुजुर्ग गोपियाँ अपने हाथों से ताली बजाती थीं, तो कृष्ण एक कठपुतली की तरह नाचते थे, उनकी ताल पर समय रखते हुए। इस विषय के संबंध में, श्रील जीव गोस्वामी ने श्रीमद-भागवतम (9.4.68) का एक श्लोक उद्धृत किया है:
''साधवो हृदयं मम
साधूनां हृदयं त्व अहम्
मदन्यत् ते न जानन्ति
नाहं तेभ्यो मनगा पि''
"शुद्ध भक्त हमेशा मेरे हृदय के मूल में रहता है, और मैं हमेशा शुद्ध भक्त के हृदय में रहता हूं। मेरे भक्त मुझसे कुछ नहीं जानते, और मैं उन्हें छोड़कर किसी और को नहीं जानता।"
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार "प्रभुः" शब्द को इस प्रकार भी समझा जा सकता है। "प्र" शब्द "प्रकर्षेण" को इंगित करता है, या "अत्यधिक," और "भू" "भवति" या "जन्म लेना" को इंगित करता है। इस प्रकार "प्रभुः" इंगित करता है "प्रकर्षेण देव-तिर्यग-आदिषु भवतीति स:", या देवताओं, पशुओं, मनुष्यों और जीवन के अन्य रूपों के बीच बार-बार जन्म लेना।
प्रभु के विशुद्ध भक्त के आध्यात्मिक शरीर के प्रति प्रभु के लगाव के संबंध में श्रील जीव गोस्वामी के कथन की पुष्टि करते हुए, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने चैतन्य-चरितामृत (अंत्य 4.192-93) से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किए हैं:
दीक्षा-काले भक्त करे आत्म-समर्पण
सेई-काले कृष्ण तारे करे आत्म-सम
"दीक्षा के समय, जब कोई भक्त स्वयं को प्रभु की सेवा के लिए समर्पित कर देता है, कृष्ण उसे स्वयं के समान स्वीकार कर लेते हैं।"
सेई देह करे तारा चिद-आनंद-मय
अप्राकृत-देहे ताँगरा चरण भजाय
"जब भक्त का शरीर इस प्रकार आध्यात्मिक अस्तित्व में परिवर्तित हो जाता है, वह भक्त, उस पारलौकिक शरीर में, प्रभु के चरण कमलों की सेवा करता है।"
