श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  11.3.47 
य आशु हृदयग्रन्थिं निर्जिहीर्षु: परात्मन: ।
विधिनोपचरेद् देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम् ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
वह व्यक्ति जो आत्मा को जकड़े रखने वाली मिथ्या अहंकार की गाँठ को तुरन्त काटने का इच्छुक होता है, उसे वैदिक ग्रंथों यथा तंत्रों में प्राप्त नियमों के अनुसार भगवान केशव की पूजा करनी चाहिए।
 
One who wishes to immediately cut the knot of false ego which binds the soul should worship Lord Keshava through the rituals found in the Vedic texts such as the Tantras.
तात्पर्य
वैदिक साहित्य में परम सत्य के रहस्यमयी वर्णन हैं जो दार्शनिक अनुमान को उत्तेजित करते हैं। वेद अनुष्ठानिक समारोहों के निष्पादन के लिए भी स्वर्गीय पुरस्कार प्रदान करते हैं। लेकिन जैसा इस अध्याय के पद 44 में कहा गया है कि वेदों के ऐसे ज्ञान और कर्म-कांड खंड बालानम् अनुशासनम् हैं यानी कम बुद्धिमान या बचकाने लोगों को मानसिक अटकलों और भोग्य गतिविधि के आदी होने के कारण, वेद के इन अनुभागों का मतलब है कि ऐसे व्यक्तियों को कृष्ण चेतना के परिपूर्ण चरण में क्रमिक प्रोत्साहन के लिए वैदिक आज्ञाओं का आश्रय लेने के लिए आकर्षित करना। अब उन लोगों के लिए मार्ग जिन्होंने भौतिकवादी को कई छंदों में वर्णित किया गया है, यह छंद उन लोगों के लिए प्रक्रिया का वर्णन करता है जो विज्ञा हैं, या सीखा हुआ पारलौकिकवादी हैं। ऐसे सीखा हुआ पारलौकिकवादी को सलाह दी जाती है कि वे वैष्णव तंत्रों में वर्णित विनियमित उपासना का पालन करें जैसे कि सर्वोच्च भगवान को सीधे प्रसन्न करने के लिए श्री नारद-पंचरात्र। शब्द उपाचाered देवं तंत्रोकेना का केशवं इंगित करता है कि किसी को केशव, भगवान का परम व्यक्तित्व की सीधे पूजा करनी चाहिए, जो अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए कई अलग-अलग अवतारों में प्रकट होता है। श्रील जयदेव गोस्वामी ने भगवान के लीलाओं का वर्णन केशव के व्यक्तित्व के दस प्रमुख अवतारों का वर्णन करते हुए उनकी गीत में किया है: भगवान मछली, भगवान कछुआ, भगवान सूअर, भगवान नृसिंहदेव, भगवान वामन, भगवान परशुराम, भगवान रामचंद्र, भगवान बलराम, भगवान बुद्ध और भगवान कल्कि। शब्द उपाचाered देवं भगवान के व्यक्तित्व के लिए भक्ति सेवा को इंगित करता है। और इसलिए शब्द तंत्रोकेना, या "तंत्रों का आदेश," को वैष्णव तंत्र जैसे श्री नारद पंचरात्र को इंगित करने के लिए समझा जाना चाहिए, जो केशव की पूजा के लिए स्पष्ट और विस्तृत निर्देश देते हैं। वेदों को निगम शब्द से संदर्भित किया जाता है। और इन निगमों की विस्तृत व्याख्या आगम या तंत्र कहलाती है। जब दिव्य जीवित इकाई भौतिक शारीरिक द्वंद्वों के अप्रिय उत्पीड़न से परेशान हो जाती है, तो वह अपनी पारलौकिक स्थिति के बारे में वेदों से सुनने के लिए उत्सुक हो जाती है। इस छंद में शब्द आशु इंगित करता है कि जो लोग भौतिक अस्तित्व को शीघ्र ही समाप्त करने और पूर्ण ज्ञान के शाश्वत आनंदमय जीवन में खुद को स्थापित करने के लिए उत्सुक है, उन्हें पिछले छंदों में वर्णित प्रारंभिक वैदिक अनुष्ठानों को दरकिनार करते हुए, भगवान कृष्ण की सीधे पूजा करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)