अन्येऽभिलाषित शून्यं
ज्ञान कर्माद्य-अनावृतम्
अनुकूल्येन कृष्णानु-
शिलनं भक्ति उत्तमा
"कृष्ण भक्ति भाव का अभ्यास करना और प्रतिकूलता के बिना भौतिक लाभ की कामना के बिना भगवान कृष्ण की सेवा श्रेष्ठतम भक्ति है।" (भक्ति रसामृत सिंधु 1.1.11) तो इस तरह माया रूपी दुर्गम सागर को पार करना भगवत-धर्म या भगवान के प्रति भक्ति-भाव का वास्तविक फल नहीं है बल्कि भगवान के प्रति असीम प्रेम का एक उपोत्पाद है।
