श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  11.3.27-28 
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भ‍ुतकर्मण: ।
जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम् ॥ २७ ॥
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मन: प्रियम् ।
दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत्परस्मै निवेदनम् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
ईश्वर की अद्भुत पराशक्ति के कार्यों को सुनना, उनका गुणगान करना और उन पर ध्यान लगाना चाहिए। विशेष रूप से भगवान के प्रकटन, कार्य, गुण और पवित्र नामों में लीन रहना चाहिए। इस प्रकार प्रेरित होकर, अपने सभी दैनिक कार्यों को ईश्वर को समर्पित करना चाहिए। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ, दान और तप करना चाहिए। इसी तरह, केवल उन्हीं मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए जो भगवान की महिमा का गुणगान करते हैं। सभी धार्मिक गतिविधियों को ईश्वर को समर्पित किया जाना चाहिए। जो भी चीज अच्छी या सुखद लगे, उसे तुरंत भगवान को अर्पित करना चाहिए। अपनी पत्नी, बच्चों, घर और जीवन को भी भगवान के चरणों में समर्पित किया जाना चाहिए।
 
One should hear, praise and meditate on the wonderful transcendental activities of the Lord. He should be absorbed especially in the manifestations, activities, qualities and holy names of the Lord. Thus motivated, he should perform all his daily activities as an offering to the Lord. One should perform sacrifices, gifts and austerities only for the satisfaction of the Lord. Similarly, he should chant only those mantras which sing the glories of the Lord. All his religious activities should be performed as an offering to the Lord. Whatever he finds pleasing or enjoyable, he should immediately offer it to the Lord. He should even offer his wife, children, house and even his life at the Lord's lotus feet.
तात्पर्य
भगवद-गीता (9.27) में भगवान कृष्ण ने आदेश दिया है:

यत् करोषि यदश्नासि

यज् जुहोषि ददासी यत्

यत् तपस्यसि कौंतेय

तत् कुरुष्व मद-अर्पणम्

"हे कुन्ती के पुत्र! तुम जो कुछ भी करते हो, जो कुछ भी खाते हो, जो कुछ भी तुम यज्ञ करते हो और दान करते हो, और जो तपस्या तुम करते हो, वह सब मेरे अर्पण के रूप में करो।" श्रील प्रभुपाद ने इस श्लोक पर इस प्रकार टिप्पणी की है: "इस प्रकार, यह हर किसी का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को इस तरह से ढाले कि वह किसी भी परिस्थिति में कृष्ण को न भूले। हर किसी को अपने शरीर और आत्मा के पालन-पोषण के लिए काम करना पड़ता है, और कृष्ण यहाँ सलाह देते हैं कि व्यक्ति को उनके लिए काम करना चाहिए। जीने के लिए हर किसी को कुछ न कुछ खाना पड़ता है; इसलिए उसे कृष्ण को अर्पित भोजन के अवशेष ग्रहण करना चाहिए। किसी भी सभ्य व्यक्ति को कुछ धार्मिक अनुष्ठान करने पड़ते हैं; इसलिए कृष्ण सलाह देते हैं, 'इसे मेरे लिए करो,' और इसे अर्चनम कहा जाता है। हर किसी में कुछ दान करने की प्रवृत्ति होती है; कृष्ण कहते हैं, 'मुझे दो,' और इसका अर्थ है कि संचित हुए सारे अतिरिक्त धन को कृष्ण भावना आंदोलन को आगे बढ़ाने में उपयोग किया जाना चाहिए। आजकल लोग ध्यान की प्रक्रिया के प्रति बहुत अधिक इच्छुक हैं, जो इस युग में व्यावहारिक नहीं है, लेकिन अगर कोई अपनी माला जपते हुए दिन के चौबीसों घंटे हरे कृष्ण मंत्र का जाप करते हुए कृष्ण पर ध्यान का अभ्यास करता है, तो वह निश्चित रूप से सबसे बड़ा योगी है, जैसा कि भगवद-गीता के छठे अध्याय द्वारा प्रमाणित किया गया है।"

कई व्यक्ति जो कृष्ण की भक्ति सेवा में आकर्षित होते हैं वे भौतिक संपत्ति, प्रतिष्ठा या कौशल से भ्रमित होते हैं जो उन्होंने अपनी पिछली भौतिक गतिविधियों से अर्जित किए हैं। श्रील जीवा गोस्वामी के अनुसार इन दो श्लोकों से संकेत मिलता है कि पिछले कर्म से संचित ऐसे सभी भौतिक वैभव को सर्वोच्च भगवान को भेंट के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। व्यक्ति की प्रसिद्धि, शिक्षा, संपत्ति आदि का उपयोग भगवान के मिशन को पूरा करने के लिए किया जाना चाहिए। कभी-कभी ईर्ष्यालु भौतिकवादी यह पूछते हैं कि व्यक्ति को भगवान की सेवा में अपना धन और शिक्षा क्यों बर्बाद करनी चाहिए जबकि ऐसी चीजों का उपयोग अस्थायी भौतिक शरीर को संतुष्ट करने के लिए बेहतर तरीके से किया जा सकता है। वास्तव में, हालाँकि, हमारे पास जो कुछ भी है, इस शरीर सहित, अंततः सर्वोच्च भगवान की संपत्ति है, जो सभी अस्तित्व का निर्माता, पालनहार और विनाशक है। इसलिए, व्यक्ति को भगवान की भक्ति सेवा में अपने तथाकथित वैभव को जोड़कर धन्य होना चाहिए। अन्यथा, जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, मृत्युः सर्व-हरश्चाहम: सर्वोच्च भगवान मृत्यु के समय हमारे सामने मृत्यु के रूप में प्रकट होंगे, और हमारी सभी संपत्ति को हिंसक रूप से ले जाएंगे। इसलिए, ऐसी संपत्ति को शांतिपूर्वक भगवान के चरण कमलों में अर्पित कर देना चाहिए जबकि हम अभी भी जीवित हैं और इस तरह की भेंट के पवित्र परिणाम का आनंद लेने में सक्षम हैं।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, तप, तपस्या, का अर्थ है कि व्यक्ति को एकादशी-व्रत जैसे व्रतों का पालन करना चाहिए, जिसमें महीने में दो बार अनाज और बीन्स का उपवास किया जाता है। जप्तम शब्द का तात्पर्य भगवान के पवित्र नामों का जाप करने से है, जैसे हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने आगे बताया है कि व्यक्ति अपने परिवार को भगवान के भक्तों में बदलकर अपनी पत्नी, बच्चों और घर को भगवान को अर्पित कर सकता है। तथाकथित स्टेटस सिंबल की खोज में कृत्रिम रूप से फुलाए जाने के बजाय, परिवार को यह समझने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे भगवान के शाश्वत सेवक हैं। और जब पूरा परिवार भगवान की सेवा के लिए समर्पित हो जाता है, तो एक बहुत ही सुंदर स्थिति बन जाती है।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने कहा है कि यदि किसी मनुष्य को भागवत-धर्म की प्रक्रिया में दीक्षित नहीं किया जाता है तो उसे अपनी स्थूल भौतिक इंद्रियों से प्राप्त अनिश्चित ज्ञान पर निर्भर रहना पड़ता है। भगवान के शाश्वत स्वरूप, क्रीड़ाओं और असंख्य अलौकिक गुणों के उदात्त वर्णनों के प्रति उदासीन, विश्वासहीन भौतिकवादी सांसारिक भोग के स्तर पर भटकता रहता है। लेकिन अगर कोई सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान की वास्तविकता को समझ सकता है जैसा कि अधिकृत वैदिक साहित्य में वर्णित है, तो उसे तृदंड-संन्यास के आदेश को स्वीकार करना चाहिए, या कम से कम उसे शरीर, मन और शब्दों पर संयम का अभ्यास करना चाहिए और इस प्रकार आत्म-नियंत्रित और परम सत्य के प्रति स्थिर होना चाहिए। तब उसकी सभी इच्छाएँ, उसके द्वारा दिया गया सारा दान, और उसकी तपस्याएँ और मंत्रों का उच्चारण - दूसरे शब्दों में, उसका पूरा व्यक्तित्व, उसका घर, उसके बच्चे, उसकी पत्नी और उसका जीवन वायु - सर्वोच्च प्रभु को हार्दिक प्रसाद बन जाता है। जब एक जीव लगातार सर्वोच्च प्रभु के अधिकृत वर्णनों को सुनता है और अपनी सभी गतिविधियों को अन्य गतिविधियों से परहेज करते हुए, प्रभु की सेवा में जोड़ता है, तो उसे भागवत-धर्म के स्तर पर स्थिर माना जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)