सर्वत्रात्मेश्वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम् ।
विविक्तचीरवसनं सन्तोषं येन केनचित् ॥ २५ ॥
अनुवाद
ध्यान के द्वारा मनुष्य को अपने आपको नित्य आत्मा और भगवान् को हर चीज का स्वामी मानकर देखना चाहिए। ध्यान को बढ़ाने के लिए घर के प्रति मोह व लगाव को त्यागकर एकांत जगह में रहना चाहिए। शरीर के सजावट संबंधी पदार्थों का त्याग करके, मनुष्य खुद को लत्तों या पेड़ों की छाल से ढँक ले। इस प्रकार से, किसी भी भौतिक परिस्थिति में संतुष्ट रहना सीखना चाहिए।
One should meditate on himself as the eternal soul and on God as the ultimate controller of everything. To enhance meditation, one should live in solitude and give up false attachment to his home and household goods. Giving up the ornaments of the perishable body, one should cover himself with rags or the bark of trees. Thus, one should learn to be content in any material circumstances.
तात्पर्य
काइवल्यम, या एकांतवास, भौतिक व्यवधानों से मुक्त एक स्थान को दर्शाता है। इसलिए, वैष्णवों की संगति में रहना चाहिए, जहाँ सामान्य लक्ष्य कृष्ण चेतना में उन्नति करना है। विशेष रूप से कलि-युग में, यदि कोई अन्य सभी से भौतिक रूप से अलग-थलग रहने की कोशिश करता है, तो इसका परिणाम ह्रास या पागलपन होगा। अनिकेतताम का अर्थ है कि व्यक्ति को अपने "घर की मीठी घर" की अल्पकालिक संतुष्टि के नशे में नहीं होना चाहिए, जो किसी भी क्षण किसी की पिछली गतिविधियों द्वारा उत्पन्न अप्रत्याशित परिस्थितियों से गायब हो जाएगी। इस युग में आधुनिक शहरों में पेड़ की छाल पहनना वास्तव में संभव नहीं है, न ही कपड़े के मात्र स्क्रैप पहनना है। पहले, मानव संस्कृति ने आध्यात्मिक उन्नति के हित में तपस्या, या तपस्याओं का अभ्यास करने वालों को समायोजित किया था। हालाँकि, इस युग में, सबसे जरूरी ज़रूरत पूरे मानव समाज में भगवद-गीता के संदेश का प्रचार करना है। इसलिए, यह अनुशंसा की जाती है कि वैष्णव स्वच्छ और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें, शरीर को शालीनता से ढकें ताकि सशर्त आत्माएँ वैष्णवों की कठोर तपस्याओं से भयभीत या विकर्षित न हों। कलि-युग में सशर्त आत्माएँ भौतिक इंद्रिय संतुष्टि से अत्यधिक जुड़ी होती हैं, और अत्यधिक तपस्याओं की सराहना नहीं की जाती है, बल्कि इसके बजाय उन्हें मांस के घृणित खंडन माना जाता है। बेशक, आध्यात्मिक उन्नति के लिए तपस्या की आवश्यकता है, लेकिन श्रील प्रभुपाद द्वारा कृष्ण चेतना आंदोलन को सफलतापूर्वक फैलाने में स्थापित व्यावहारिक उदाहरण यह था कि लोगों को कृष्ण चेतना की ओर आकर्षित करने के लिए सभी भौतिक चीजों का उपयोग किया जाना चाहिए। इसलिए, वैष्णव कभी-कभी कृष्ण चेतना को वितरित करने के उच्च सिद्धांत की सेवा के लिए साधारण पोशाक अपना सकते हैं। किसी भी मामले में, किसी को भी भौतिक स्थिति में संतुष्ट होना सीखना चाहिए ताकि मृत्यु के क्षण की तैयारी हो सके। भगवद-गीता के अनुसार, मृत्यु के समय इस जीवन में हमारी बनाई गई विशेष चेतना हमें हमारी भविष्य की स्थिति तक ले जाएगी। इसलिए, मानव जीवन को मृत्यु के गंभीर परीक्षणों के दौरान पूर्ण सत्य पर अपने मन को सफलतापूर्वक टिकाने के लिए एक प्रकार के अभ्यास के रूप में देखा जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥