श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  11.3.24 
शौचं तपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयो: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
आध्यात्मिक गुरु की सेवा करने के लिए शिष्य को स्वच्छता, तपस्या, सहनशीलता, मौन, वैदिक ज्ञान का अध्ययन, सादगी, ब्रह्मचर्य, अहिंसा और गर्मी, ठंड, खुशी और दुख जैसे भौतिक द्वंद्वों का सामना करते हुए समभाव सीखना चाहिए।
 
To serve the Guru, the disciple must learn cleanliness, austerity, tolerance, silence, study of the Vedas, simplicity, celibacy, non-violence and equanimity in the face of dualities like heat and cold, happiness and sorrow.
तात्पर्य
शौच या "स्वच्छता" से आंतरिक तथा बाहरी दोनों प्रकार की शुद्धता का बोध होता है। व्यक्ति को दिन में कम से कम एक बार साबुन और पानी से नहाकर बाहरी रूप से साफ रहना चाहिए और हो सके तो संभव तीन बार नहाना चाहिए। व्यक्ति को आंतरिक तौर पर तब शुद्ध माना जाता है जब वह मिथ्या अभिमान और अहंकार के प्रदूषण से मुक्त होता है। तप या "तपस्या" का अर्थ है कि मन के अतार्किक आवेगों के बावजूद व्यक्ति को जीवन में अपने उचित कर्तव्य का पालन करने में अडिग रहना चाहिए। विशेष रूप से, व्यक्ति को जलती हुई क्रोध और अनैतिक यौन जीवन का आग्रह नियंत्रित करना चाहिए। यदि कोई मनुष्य वासना, क्रोध और लालच के आवेगों को नियंत्रित नहीं करता है, तो वह अपनी वास्तविक स्थिति को समझने की अपनी शक्ति खो देता है। जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग की भारी समस्याओं को हल करने के लिए मानव जीवन एक सुनहरा अवसर है। विष्णु पुराण (3.8.9) के अनुसार:

वर्णाश्रमाचार-वता

पुरुषेण परः पुमान

विष्णुराराध्यते पन्था

न अन्य तत्-तोष-कारणम्

प्रत्येक मनुष्य ईश्वर, विष्णु को अपने निर्धारित कार्य का फल समर्पित करके आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर सकता है। इसी तरह, भगवद-गीता (18.45) में भगवान कृष्ण स्पष्ट रूप से बताते हैं, स्व-स्वे कर्मणि अभिरतः संसिद्धि लभते नरः। व्यक्ति को साधु का जीवन अपनाने या योगी बनकर जंगल में रहने की ज़रूरत नहीं है; वह अपने व्यावसायिक कर्तव्यों को सर्वोच्च भगवान को समर्पित करके पूर्णता प्राप्त कर सकता है। इसी तरह, भक्तिविनोद ठाकुर ने कहा है, नामस््रय करि यतने तुमी, थकाहा आपना काजे। यदि कोई ईमानदारी से हरि कृष्ण, हरि कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरि हरि/ हरि राम, हरि राम, राम राम, हरि हरि का जाप करके कृष्ण के पवित्र नामों की शरण लेता है, तो वह अपनी सामान्य दैनिक गतिविधियों की सीमा के भीतर आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करेगा। दुर्भाग्य से, यदि कोई मनुष्य सभ्य जीवन के विनियामक सिद्धांतों की उपेक्षा करता है जो अवैध यौन संबंध, मांसाहार, नशा और जुआ को रोकते हैं, तो वह निश्चित रूप से वासना और क्रोध की लहरों से अभिभूत हो जाएगा, जो आध्यात्मिक जीवन की वास्तविकता के बारे में किसी की चेतना को पूरी तरह से ढक देता है और उसे अस्थायी भौतिक शरीर की स्वप्निलता में शामिल होने के लिए आकर्षित करता है। जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (3.39) में कहा है:

आवृतं ज्ञानमेतेन

ज्ञानिनो नित्य-वैरिणा

काम-रूपेण कुन्तेय

दुष्पूरेणानलेन च

"इस प्रकार मनुष्य की शुद्ध चेतना वासना के रूप में उसके शाश्वत शत्रु से ढकी हुई है, जो कभी संतुष्ट नहीं होती है और आग की तरह जलती है।" इसलिए, इस श्लोक में तप या "तपस्या" शब्द यह इंगित करता है कि व्यक्ति को अपने निर्धारित कर्तव्य में लगा रहेना चाहिए और वासना, क्रोध और लोभ की लहरों के कारण अधीर या अनियमित नहीं होना चाहिए।

तितिक्षां या "सहिष्णुता" शब्द बताता है कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति को क्षमाशील होना चाहिए। भौतिक संसार शर्मनाक और चिढ़ाने वाली स्थितियों से भरा हुआ है, और जब तक कोई बहुत अधिक क्षमाशील होने के लिए इच्छुक नहीं होगा, तब तक वह बदले की भावना से संक्रमित हो जाएगा, जो उसकी आध्यात्मिक चेतना को खराब कर देता है। मौणम या "मौन" का मतलब है कि किसी को बेकार या तुच्छ विषयों पर नहीं बोलना चाहिए, बल्कि मानव जीवन के वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए जैसे घर वापस जाना, वापस भगवान के पास जाना। पूरी तरह से चुप रहना अज्ञानता का लक्षण है; चेतना की कमी के कारण एक पत्थर चुप है। चूँकि प्रत्येक भौतिक चीज़ का अपना आध्यात्मिक समकक्ष होता है, वैदिक शास्त्रों में नकारात्मक और सकारात्मक निषेधाज्ञाएँ होती हैं। भाषण के खिलाफ नकारात्मक निषेधाज्ञा के अनुरूप सकारात्मक निषेधाज्ञा है कि किसी को हमेशा कृष्ण के बारे में बोलना चाहिए। सततं कीर्तयन्तो माम। भगवान के पवित्र नाम, प्रसिद्धि, मनोरंजन, दल आदि की महिमा करते हुए, किसी को हमेशा भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के बारे में बात करनी चाहिए। श्रीमद्-भागवतम में भी कहा गया है, श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा। सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान, कृष्ण को हमेशा सुनना चाहिए, उनकी महिमा करनी चाहिए, उन पर ध्यान करना चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए। इस अध्याय के श्लोक 21 में कहा गया था, शब्द पारे च निष्णातम। वास्तविक आध्यात्मिक गुरु शब्दे पारे, या आध्यात्मिक दुनिया का वर्णन करने वाले पारलौकिक ध्वनि कंपन में विशेषज्ञ होता है। ध्यान और योग की मनगढ़ंत प्रणालियों के मूर्ख समर्थकों द्वारा समर्थित, कोई भी कृत्रिम रूप से खाली दिमाग या अवाक नहीं रह सकता है। लेकिन किसी को कृष्ण की प्रेममयी सेवा और कृष्ण की प्रशंसा करने के लिए इतनी प्रेमपूर्वक आकर्षित किया जाना चाहिए कि उसके पास बकवास बोलने के लिए एक भी क्षण न हो। यही मौणम शब्द का तात्पर्य है। स्वाध्याय का अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए और दूसरों को भी पढ़ाना चाहिए। भगवत-गीता में यह उल्लेख किया गया है कि एक ब्राह्मण में ज्ञान और विज्ञान, शास्त्र का ज्ञान और ज्ञान का व्यावहारिक एहसास होना चाहिए। विशेष रूप से उन पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए जो सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान की सेवा करने की इच्छा को बढ़ाती हैं। उनकी दिव्य कृपा ओम् विष्णुपादा परमहंस परिव्राजकाचार्य अष्टोत्तर-शत श्री श्रीमद् भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने कुछ ही वर्षों में वास्तविक पुस्तकालय लिखा है। पारलौकिक ज्ञान के। यह पूरी दुनिया में व्यावहारिक रूप से देखा जा रहा है कि जब स्वाध्याय, या वैदिक अध्ययन के सिद्धांत को इन पुस्तकों पर लागू किया जाता है, जैसे कि श्रीमद्-भागवतम, भगवद-गीता अस इट ईज़, चैतन्य-चरितामृत और द नेक्टर ऑफ डिवोशन, तो ईमानदार पाठक उत्साहपूर्ण मंथन से भरे हुए हैं। सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान की सेवा करने का दृढ़ संकल्प। इस पारलौकिक साहित्य के आधार पर कृष्ण चेतना के लिए संपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय सोसायटी पूरे विश्व में विस्तार कर रही है। स्वाध्याय धार्मिक ग्रंथों की सट्टा या काल्पनिक व्याख्याओं को इंगित नहीं करता है, और न ही किसी को अपने तथाकथित विद्वान के रूप में अपने झूठे प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए कई पुस्तकों को पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। किसी को उन पुस्तकों को पढ़ना चाहिए जो ज्ञान और त्याग में व्यावहारिक आध्यात्मिक उन्नति को प्रेरित करती हैं, जैसा कि श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों द्वारा उदाहरण दिया गया है।

आर्जवम् शब्द सरलता और सीधेपन को दर्शाता है। श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार "स्वच्छताम", "स्पष्टता, पारदर्शिता", सीधेपन का पर्यायवाची शब्द है। जब तक किसी का चेतना स्वच्छ न हो जाएगी, वह कई कुटिल साधन अपनाएगा। सीधेपन का मतलब यह नहीं है कि ईमानदारी के नाम पर दूसरों का अपमान किया जाना चाहिए, लेकिन आपको विनम्रतापूर्वक सच्चाई बोलनी चाहिए। ब्रह्मचर्यम्, या "ब्रह्मचर्य", का मतलब या तो महिलाओं के संग से पूरी तरह त्याग करना है या गृहस्थ जीवन के वैदिक सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करना है, जो संत बच्चों को जन्म देने के उद्देश्य से यौन जीवन को नियंत्रित करते हैं। अहिंसा का मतलब है कि किसी भी जीवित प्राणी के ख़िलाफ़ हिंसा नहीं की जानी चाहिए। जब तक कि व्यक्ति कर्म के सूक्ष्म नियमों से अवगत न हो, जिसके द्वारा एक जीवित प्राणी आनंद लेता है और पीड़ित होता है, तब तक कोई भी वास्तव में अहिंसा का अभ्यास नहीं कर सकता है। अंततः भौतिक दुनिया हिंसा से भरी हुई है, और प्रकृति का नियम, जो हर जीवित प्राणी पर बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु को थोपता है, स्वयं हिंसा से भरे हुए हैं। इसलिए, अगर किसी तरह से आप दूसरों को कृष्ण के प्रति समर्पण करने के लिए मना सकते हैं और इस तरह उन्हें भौतिक प्रकृति के हिंसक नियमों से मुक्त कर सकते हैं, तो यही अहिंसा की पूर्णता है। समत्वं द्वंद्व-संज्ञयोः से संकेत मिलता है कि जब परेशान करने वाली भौतिक द्वंद्व स्पष्ट हो जाती हैं तो व्यक्ति को एक शांत दिमाग रखना चाहिए। कृष्ण ने भगवद-गीता (2.14) में कहा है:

मात्रा-स्पर्शास्तु कौंतेय

शीतोष्ण-सुख-दुःख-दाः

आगमापायिनोअनित्यास

ताम्स्तितिक्षस्व भारत

"हे कुंती के पुत्र, खुशी और दुख की अनित्य उपस्थिति, और समय के साथ उनका गायब होना, सर्दी और गर्मी के मौसमों की उपस्थिति और गायब होने की तरह है। वे इंद्रिय धारणा से उठते हैं, हे भरत के वंशज, और व्यक्ति को बिना परेशान हुए उन्हें सहन करना सीखना चाहिए।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)