श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  11.3.20 
एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् ।
सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
स्वर्ग के लोकों में भी मनुष्य को स्थायी सुख नहीं मिल सकता है, जिसे वह अनुष्ठानों और यज्ञों से अगले जीवन में पा लेता है। यहाँ तक कि भौतिक स्वर्ग में भी जीव अपने बराबर वालों की होड़ से और अपने से ऊपर वालों के ईर्ष्या से परेशान रहता है। चूँकि पुण्य कर्मों की समाप्ति के साथ ही स्वर्ग का निवास समाप्त हो जाता है,इसलिए स्वर्ग के देवतागण अपने स्वर्गिक जीवन के विनाश की आशंका से डरे रहते हैं। इस तरह उनकी दशा उन राजाओं की तरह की होती है, जो सामान्य नागरिकों द्वारा ईर्ष्यावश प्रशंसित होते हैं, लेकिन शत्रु-राजाओं द्वारा लगातार परेशान किये जाते हैं जिससे उन्हें कभी वास्तविक सुख नहीं मिल पाता है।
 
Even in heaven, man cannot find the kind of lasting happiness that he can obtain in his next life by performing rituals and sacrifices. Even in the physical heaven, the living entity is distracted by competition among equals and jealousy of superiors. Since the stay in heaven ends with the end of pious activities, the demigods of heaven are afraid of the loss of their heavenly life. Thus their condition is like that of kings who are envied by the common people but are constantly persecuted by enemy kings, so that they can never find real happiness.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी ने छान्दोग्य उपनिषद (8.1.6) से निम्नलिखित पाठ उद्धृत किया है: तद्यथाह कर्म-चितो लोकः क्षीयते, एवं एवामुत्र पुण्य-चितो लोकः क्षीयते। "भौतिक सुख की वर्तमान स्थिति, किसी के पिछले काम का परिणाम, अंततः समय के साथ समाप्त हो जाएगी। इसी तरह, यद्यपि पवित्र कार्यों को करके कोई अगले जन्म में उच्च स्थिति में पहुँच जाएगा, लेकिन वह भविष्य की स्थिति भी समाप्त हो जाएगी।" भौतिक आनंद का आधार वह विशिष्ट शरीर है जिसे किसी ने प्राप्त किया है। भौतिक शरीर कर्म-चितः है, किसी की पिछली भौतिक गतिविधियों का संचित परिणाम। यदि किसी को सौंदर्य, शिक्षा, लोकप्रियता, शक्ति वगैरह से सुशोभित शरीर दिया जाता है, तो निश्चित रूप से भौतिक आनंद का उसका स्तर उच्च श्रेणी का होता है। दूसरी ओर, यदि कोई बदसूरत, मानसिक रूप से मंद, अपंग या दूसरों के लिए प्रतिकूल है, तो उसके भौतिक सुख की बहुत कम आशा होती है। हालाँकि, दोनों ही मामलों में, स्थिति क्षणभंगुर और अस्थायी है। जिसने एक आकर्षक शरीर प्राप्त किया है, उसे आनन्दित नहीं होना चाहिए, क्योंकि मृत्यु जल्दी ही ऐसी मादक स्थिति का अंत कर देगी। इसी तरह, जिसने एक घृणित स्थिति में जन्म लिया है, उसे विलाप नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसकी पीड़ा भी अस्थायी है। सुंदर आदमी और बदसूरत आदमी, अमीर और गरीब, शिक्षित और मूर्ख सभी को कृष्ण भावना से ओतप्रोत होने का प्रयास करना चाहिए ताकि वे अपनी शाश्वत संवैधानिक स्थिति तक ऊपर उठ सकें, जो इस भौतिक ब्रह्मांड से परे ग्रहों में निवास करना है। मूल रूप से प्रत्येक जीवित इकाई अकल्पनीय रूप से सुंदर, बुद्धिमान, धनी और इतनी मजबूत है कि उसका आध्यात्मिक शरीर हमेशा के लिए रहता है। परन्तु हम मूर्खतावश इस शाश्वत, आनंदमय स्थिति को त्याग देते हैं क्योंकि हम शाश्वत जीवन की शर्त को पूरा करने को इच्छुक नहीं होते हैं। शर्त यह है कि व्यक्ति भगवान कृष्ण के परम व्यक्तित्व के लिए प्रेमी होना चाहिए। यद्यपि कृष्ण का प्रेम सबसे उत्तम परमानंद है, जो भौतिक ब्रह्मांड के सबसे प्रबल सुख से लाखों गुना अधिक है, फिर भी हम मूर्खतावश सर्वोच्च भगवान के साथ अपने प्रेम संबंध को तोड़ देते हैं और कृत्रिम रूप से अहंकार और झूठे गर्व के भौतिक वातावरण में स्वतंत्र भोगी बनने का प्रयास करते हैं। यदि कोई इस ब्रह्मांड के ऊँचे स्वर्गीय ग्रहों तक पहुँच भी जाता है तब भी वह विभिन्न प्रकार के कष्टों से पीड़ित होगा। भौतिक जगत में प्रत्येक सशर्त आत्मा सबसे महान व्यक्ति बनना चाहती है। इसलिए व्यक्ति लगातार अपने बराबर के लोगों से परेशान रहता है जिनकी इच्छा भी ऐसी ही होती है। इस स्थिति को आमतौर पर भौतिक अस्तित्व की "चूहा दौड़" कहा जाता है। स्वर्गीय ग्रहों पर भी स्वर्गीय विशिष्टता के लिए एक समान चूहा दौड़ होता है। चूंकि कुछ व्यक्ति अनिवार्य रूप से हमारी अपनी उपलब्धियों से अधिक श्रेष्ठ होते हैं, इसलिए दूसरों को उन्हीं पुरस्कारों का आनंद लेते हुए देखने पर हमारे हृदय ईर्ष्या से जल उठते हैं जिनके लिए हमने प्रयास किया है। और क्योंकि हमारी पूरी स्थिति अस्थायी है, इसलिए हमें स्वर्गीय ग्रहों पर भी भय, चिंता और मृत्यु से गुजरना होगा। यहाँ दिया गया उदाहरण बहुत अच्छा है। मामूली राजाओं को आम नागरिकों द्वारा उनकी संपत्ति, शक्ति और प्रसिद्धि के लिए ईर्ष्या से सराहा जा सकता है, परन्तु ऐसे राजा स्वयं अन्य राजाओं से प्रतिद्वंद्विता और धमकियों के कारण लगातार ईर्ष्या, आक्रोश और भय से जलते रहते हैं। इसी तरह, आधुनिक राजनेता लगातार ईर्ष्या और भय से परेशान रहते हैं।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने बताए हैं कि सांसारिक सुख पाने और दुख टालने के लिए आतुर बद्ध आत्माएँ, काम सम्बन्धों का सहारा लेती हैं और इस प्रकार कर्मफलों के कठिन परिश्रम में समर्पित हो जाती हैं। किन्तु जो ज्ञानी हैं वे इस प्रकार के सकल भौतिकवादी प्रयासों की चरम निरर्थकता को समझ सकते हैं। कोई तथाकथित पत्नी, घर, बच्चे, रिश्तेदार, बैंक खाता इत्यादि सभी अस्थायी सांसारिक आकर्षण हैं, और प्रकट रहते हुए भी वे किसी की इन्द्रियों को वास्तविक सन्तुष्टि नहीं दे सकते। इस संसार में धन प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को व्यावहारिक रूप से अपनी ही आत्मा का हत्यारा बनने के लिए मजबूर होना पड़ता है। भौतिकवादी गतिविधियों से आनन्द प्राप्त करने की कोई सम्भावना नहीं है, क्योंकि वे अस्थायी संवेदों के साथ अस्थायी विषयों की भीषण खोज में किये जाते हैं। जब बद्ध आत्मा अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेती है तो वह प्रसन्न हो जाती है और दूसरों के सामने शेखी बघारती है जैसे कि उसकी उपलब्धियाँ स्थायी हों। और जब उसे हार का सामना करना पड़ता है तो वह विलाप में डूब जाती है। अपने आप को कर्ता मानने की ऐसी प्रवृत्ति दुर्बल बुद्धि का संकेत है, क्योंकि वास्तव में जीव केवल भौतिक देह के अन्दर इच्छा कर रहा होता है। शरीर स्वयं भगवान के नियंत्रण में प्रकृति के बलों द्वारा चलित होता है। स्वामी और सेवक, पिता और पुत्र, पति और पत्नी के सम्बन्ध शुभकामनाओं और सेवा के आदान-प्रदान को सँजो कर रखते हैं जो भौतिक संतुष्टि की भावना देते हैं, परन्तु ऐसी क्षणभंगुर भक्ति कभी भी आत्मा के लिए शाश्वत परम लाभ नहीं ला सकती। ऐसी अस्थायी संतुष्टि द्वारा, माया बद्ध आत्मा को प्रेरित करती है कि वह भौतिक प्रकृति के सापेक्षिक पुरस्कारों का पीछा करते हुए पूरे भौतिक संसार में भटके। कर्म के सूक्ष्म नियमों के अनुसार जीव सुख और दुख प्राप्त करता है। कोई भी व्यक्ति बलपूर्वक सुख प्राप्त नहीं कर सकता, चाहे वह कितनी भी बड़ी कठिनाई क्यों न झेले अथवा वह कितने भी लम्बे समय तक क्यों न प्रयास करता रहे। इसलिए जिनकी बुद्धि निर्मल होती है उन्हें कृष्ण के चरणकमलों की शरण ले लेनी चाहिए और स्थायी भौतिक सुख की हास्यास्पद खोज को त्याग देना चाहिए, जिस खोज की तुलना एक कुत्ते द्वारा अपनी ही दुम का पीछा करने से की जा सकती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)