श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने बताए हैं कि सांसारिक सुख पाने और दुख टालने के लिए आतुर बद्ध आत्माएँ, काम सम्बन्धों का सहारा लेती हैं और इस प्रकार कर्मफलों के कठिन परिश्रम में समर्पित हो जाती हैं। किन्तु जो ज्ञानी हैं वे इस प्रकार के सकल भौतिकवादी प्रयासों की चरम निरर्थकता को समझ सकते हैं। कोई तथाकथित पत्नी, घर, बच्चे, रिश्तेदार, बैंक खाता इत्यादि सभी अस्थायी सांसारिक आकर्षण हैं, और प्रकट रहते हुए भी वे किसी की इन्द्रियों को वास्तविक सन्तुष्टि नहीं दे सकते। इस संसार में धन प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को व्यावहारिक रूप से अपनी ही आत्मा का हत्यारा बनने के लिए मजबूर होना पड़ता है। भौतिकवादी गतिविधियों से आनन्द प्राप्त करने की कोई सम्भावना नहीं है, क्योंकि वे अस्थायी संवेदों के साथ अस्थायी विषयों की भीषण खोज में किये जाते हैं। जब बद्ध आत्मा अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेती है तो वह प्रसन्न हो जाती है और दूसरों के सामने शेखी बघारती है जैसे कि उसकी उपलब्धियाँ स्थायी हों। और जब उसे हार का सामना करना पड़ता है तो वह विलाप में डूब जाती है। अपने आप को कर्ता मानने की ऐसी प्रवृत्ति दुर्बल बुद्धि का संकेत है, क्योंकि वास्तव में जीव केवल भौतिक देह के अन्दर इच्छा कर रहा होता है। शरीर स्वयं भगवान के नियंत्रण में प्रकृति के बलों द्वारा चलित होता है। स्वामी और सेवक, पिता और पुत्र, पति और पत्नी के सम्बन्ध शुभकामनाओं और सेवा के आदान-प्रदान को सँजो कर रखते हैं जो भौतिक संतुष्टि की भावना देते हैं, परन्तु ऐसी क्षणभंगुर भक्ति कभी भी आत्मा के लिए शाश्वत परम लाभ नहीं ला सकती। ऐसी अस्थायी संतुष्टि द्वारा, माया बद्ध आत्मा को प्रेरित करती है कि वह भौतिक प्रकृति के सापेक्षिक पुरस्कारों का पीछा करते हुए पूरे भौतिक संसार में भटके। कर्म के सूक्ष्म नियमों के अनुसार जीव सुख और दुख प्राप्त करता है। कोई भी व्यक्ति बलपूर्वक सुख प्राप्त नहीं कर सकता, चाहे वह कितनी भी बड़ी कठिनाई क्यों न झेले अथवा वह कितने भी लम्बे समय तक क्यों न प्रयास करता रहे। इसलिए जिनकी बुद्धि निर्मल होती है उन्हें कृष्ण के चरणकमलों की शरण ले लेनी चाहिए और स्थायी भौतिक सुख की हास्यास्पद खोज को त्याग देना चाहिए, जिस खोज की तुलना एक कुत्ते द्वारा अपनी ही दुम का पीछा करने से की जा सकती है।
