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bhagavat 11.3.19: संपत्ति दुःख का एक निरंतर स्रोत है जिसे अर्जित करना सबसे कठिन है और जो आत्मा के लिए एक तरह से मृत्यु के समान है। वास्तव में, किसी को अपनी संपत्ति से क्या लाभ मिलता है? इसी तरह, कोई अपने घर, सन्तान, रिश्तेदारों और पालतू जानवरों से कैसे स्थायी सुख प्राप्त कर सकता है, जो उसके कठोर परिश्रम से अर्जित धन से पालित होते हैं?   |   bhagavat अध्याय 11.3: माया से मुक्ति   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  11.3.19 
नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना ।
गृहापत्याप्तपशुभि: का प्रीति: साधितैश्चलै: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
संपत्ति दुःख का एक निरंतर स्रोत है जिसे अर्जित करना सबसे कठिन है और जो आत्मा के लिए एक तरह से मृत्यु के समान है। वास्तव में, किसी को अपनी संपत्ति से क्या लाभ मिलता है? इसी तरह, कोई अपने घर, सन्तान, रिश्तेदारों और पालतू जानवरों से कैसे स्थायी सुख प्राप्त कर सकता है, जो उसके कठोर परिश्रम से अर्जित धन से पालित होते हैं?
 
Wealth is an inexhaustible source of misery, is most difficult to acquire, and is in a way a form of death to the soul. What benefit does one derive from one's wealth? Likewise, how can one derive lasting happiness from one's so-called home, children, relatives and domestic animals, which are nurtured by one's hard-earned money?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)