श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  11.3.17 
श्रीराजोवाच
यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभि: ।
तरन्त्यञ्ज: स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
राजा निमि बोले, अत: हे महान ऋषे! कृपया यह बताएँ कि किस प्रकार एक मूढ़ मनुष्य भी भगवान् की उस माया को सरलता से पार कर सकता है, जो उन लोगों के लिए सदैव दुर्लंघ्य है जिन्हें अपने ऊपर नियंत्रण नहीं होता।
 
King Nimi said, Therefore, O great sage, please explain how even a foolish materialist can easily overcome the illusion of the Lord, which is always insurmountable for those who have no self-control.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, स्थूलधीः से उन लोगों का संकेत मिलता है जो अज्ञतावश खुद को स्थूल भौतिक देह से जोड़ते हैं और जो इसलिए में प्रकृति के उन सूक्ष्म नियमों का विश्लेषण करने में असमर्थ होते हैं जिनके द्वारा आत्मा भ्रम में भ्रमण करती है। श्रील जीव गोस्वामी टिप्पणी करते हैं कि स्थूलधीः उन तथाकथित पवित्र व्यक्तियों को भी इंगित करता है जो भगवान की प्रेमपूर्ण भक्ति सेवा में संलग्न होकर स्वयं को घर वापस, भगवान के पास वापस जाने के लिए तैयार करने की कोशिश करने के बजाय भौतिक इंद्रियों की संतुष्टि के लिए धूमधाम से धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, राजा निम्मी पहले से ही भगवान के एक उन्नत भक्त थे और इसलिए जानते थे कि व्यक्ति माया की भ्रामक ऊर्जा मायिका को पार कर सकता है, भगवान के चरण कमलों के समर्पण और शुद्ध भक्ति सेवा द्वारा उन्हें प्रसन्न करके। इसलिए राजा उन लोगों के लाभ के लिए प्रश्न पूछ रहे थे जो झूठे तौर पर खुद को बहुत अधिक विद्वान मानते हैं लेकिन वास्तव में भौतिकवादी फलदायी गतिविधियों के आदी हैं, जो उन्हें भ्रम में तेजी से उलझाते हैं। इस संबंध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने यह दिखाने के लिए अमर-कोष शब्दकोश से उद्धृत किया है कि अकृततभिः अपूर्णताव, या जिसका जीवन खाली है, का संकेत देता है।

प्रत्येक जीवित प्राणी का सर्वोच्च जीवित प्राणी, कृष्ण के साथ एक शाश्वत संबंध है। व्यक्ति कृष्ण को अपने शाश्वत गुरु, अपने सबसे अंतरंग मित्र, अपने प्रिय बच्चे या अपने वैवाहिक आकर्षण की वस्तु के रूप में सोचकर उन्हें प्यार कर सकता है। बेशक, इस तरह के परमानंद को कभी भी साधारण, भौतिक भावनाओं के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए, जो आध्यात्मिक रसों या रिश्तों के विकृत प्रतिबिंब हैं। भौतिक दुनिया में हम सेवा, मित्रता, माता-पिता के प्यार और वैवाहिक प्रेम के समान संबंधों को फिर से जीवंत करने का प्रयास करते हैं, लेकिन ऐसी भावनाओं का उद्देश्य एक अस्थायी भौतिक शरीर है, जो प्रकृति के नियमों से जल्दी ही तबाह हो जाता है। इन प्रेमपूर्ण भावनाओं को सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण की आध्यात्मिक देह की ओर निर्देशित किया जाना चाहिए, जो सभी सुंदरता और अलौकिक आनंद के भंडार हैं। जिसने कृष्ण के लिए अपने प्रेम को निर्देशित करने की कला नहीं सीखी है, वह अपूर्ण है, या जिसका जीवन अंततः खाली है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, जिसका जीवन खाली है उसे मंद-धी भी कहा जा सकता है, या जिसकी बुद्धि व्यापक अनुभव की कमी के कारण अपंग है। एक शुद्ध वैष्णव राजा निम्मी इतने दयालु थे कि उन्होंने पूछा, "ऐसे अपंग-चित्त वाले लोग माया को सबसे आसान तरीके से कैसे पार कर सकते हैं, क्योंकि स्वभाव से वे आध्यात्मिक मामलों में बहुत आलसी होते हैं?"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)