श्रील श्रीधर स्वामी ने निम्नलिखित श्लोक को इस सबूत के रूप में उद्धृत किया है कि भगवान ब्रह्मा को विनाश के समय भगवान के पास वापस जाना चाहिए:
ब्रह्मणा सह ते सर्वे
सम्प्राप्ते प्रतिसंञ्चरे
परस्यान्ते कृतात्मानः
प्रविशंति परं पदम्
"अंतिम विनाश के समय सभी आत्म-साक्षात्कारी आत्माएं ब्रह्मा के साथ परम निवास में प्रवेश करती हैं।" चूंकि ब्रह्मा को कभी-कभी सर्वोच्च भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त माना जाता है, इसलिए उन्हें केवल अव्यक्त नामक भौतिक प्रकृति की अप्रकट अवस्था में प्रवेश करने के बजाय निश्चित रूप से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए। इस संबंध में श्रील श्रीधर स्वामी बताते हैं कि गैर-भक्तों का एक वर्ग है जो अश्वमेध यज्ञ और अन्य बलिदानों को करने से ब्रह्मा के ग्रह को प्राप्त करते हैं, और कुछ मामलों में ब्रह्मा स्वयं सर्वोच्च भगवान के भक्त नहीं हो सकते हैं। इसलिए अव्यक्तं विशते सूक्ष्म को यह इंगित करने के लिए समझा जा सकता है कि ऐसा गैर-भक्त ब्रह्मा भौतिक विशेषज्ञता की अंतिम सार्वभौमिक स्थिति हासिल करने के बावजूद, आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकता है। लेकिन जब ब्रह्मा सर्वोच्च भगवान के भक्त होते हैं तो अव्यक्त शब्द को आध्यात्मिक आकाश को इंगित करने के लिए लिया जा सकता है; चूंकि शर्तों वाली आत्माओं के लिए आध्यात्मिक आकाश प्रकट नहीं होता है, इसे अव्यक्त भी माना जा सकता है। यहां तक कि भगवान ब्रह्मा सर्वोच्च भगवान के सामने समर्पण किए बिना ईश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, तो अन्य तथाकथित पवित्र या विशेषज्ञ गैर-भक्तों के बारे में क्या कहना है।
इस संबंध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इंगित किया है कि ब्रह्मा के स्तर के भीतर तीन श्रेणियाँ होती हैं, अर्थात् कर्मी, ज्ञानी और भक्त। एक ब्रह्मा जो ब्रह्मांड का सबसे श्रेष्ठ कर्म है, उसे भौतिक दुनिया में वापस आना होगा; एक जीव जिसने ब्रह्मांड के भीतर सबसे महान सैद्धांतिक दार्शनिक होने के कारण ब्रह्मा पद प्राप्त कर लिया है, वह अवैयक्तिक मुक्ति प्राप्त कर सकता है; और एक जीव जिसे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के महान भक्त होने के कारण ब्रह्मा पद से सम्मानित किया गया है, वह भगवान के व्यक्तिगत निवास में प्रवेश करता है। श्रीमद-भागवतम (3.32.15) में एक और मामले का वर्णन किया गया है: एक ब्रह्मा जो भगवान का भक्त है, लेकिन जिसके मन में स्वयं को भगवान से स्वतंत्र या उसके समान समझने की प्रवृत्ति है, वह विनाश के समय महा-विष्णु के निवास को प्राप्त कर सकता है, लेकिन जब सृष्टि फिर से शुरू होती है तो उसे लौटना पड़ता है और फिर से ब्रह्मा का पद ग्रहण करना होता है। इस मामले में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द भेदा-दृष्ट्या है, जो स्वयं को स्वतंत्र रूप से शक्तिशाली मानने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। भगवान ब्रह्मा के रूप में ऐसे ऊंचे जीव के लिए संभव विभिन्न गंतव्य निश्चित रूप से साबित करते हैं कि कोई भी भौतिक स्थिति आनंद और ज्ञान के एक शाश्वत जीवन की गारंटी देने के लिए बेकार है। भगवद्-गीता में भगवान कृष्ण ने वादा किया है कि यदि कोई अन्य सभी तथाकथित दायित्वों को छोड़ देता है और भगवान की भक्ति सेवा में आत्मसमर्पण कर देता है, तो भगवान व्यक्तिगत रूप से उसकी रक्षा करेंगे और उसे आध्यात्मिक आकाश में सर्वोच्च निवास में वापस लाएंगे। कृष्ण के चरण कमलों के सामने समर्पण न करके अपने स्वयं के ज़ोरदार प्रयास से पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करना व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण है। इस तरह के अंधे प्रयास को भगवद्-गीता के अठारहवें अध्याय में बहुलायास के रूप में वर्णित किया गया है, जो दर्शाता है कि यह जुनून के भौतिक तरीके से काम करता है। ब्रह्मा जुनून के स्वामी हैं, और संपूर्ण ब्रह्मांड का उनका निर्माण और प्रबंधन निश्चित रूप से बहुलायास या ज़ोरदार प्रयास है, सबसे ऊंचे अर्थ में। लेकिन कृष्ण के चरण कमलों के समर्पण के बिना ऐसा सभी भावुक कार्य, यहाँ तक कि भगवान ब्रह्मा का भी, अंततः बेकार है।
