श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  11.3.12 
ततो विराजमुत्सृज्य वैराज: पुरुषो नृप ।
अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानल: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
तब वैराज ब्रह्मा, सर्वव्यापी रूप की आत्मा, अपने विराट शरीर को त्याग देते हैं, हे राजन्, और सूक्ष्म अव्यक्त प्रकृति में उसी तरह प्रवेश करते हैं जैसे ईंधन समाप्त हो जाने पर आग।
 
Then, O King, the soul of the gigantic form, Vairaja Brahma, abandons his gigantic body and enters the subtle unmanifested Nature, like fire when its fuel is exhausted.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के अनुसार इस श्लोक में वर्णित वैराज शब्द, उन सभी शर्तियों का योग दर्शाता है जो मूल रूप से ब्रह्मा से जन्म लेती हैं और विनाश के समय वापस उसमें समाहित हो जाती हैं। विराट-पुरुष के प्रकटन से, भगवान के सार्वभौमिक रूप से, भौतिक रचना के भीतर रूपों, गुणों और गतिविधियों का एक अस्थायी प्रदर्शन होता है। लेकिन जब सृष्टि को सर्वोच्च भगवान द्वारा वापस ले लिया जाता है, तो संपूर्ण ब्रह्मांड निष्क्रय निराकारता में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए भगवान के सार्वभौमिक रूप को भगवान के शाश्वत रूप के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। माया के राज्य में यह केवल उनके व्यक्तिगत रूप की अस्थायी काल्पनिक समानता है। श्रीमद्-भागवतम के पहले और साथ ही दूसरे कंटो में, भगवान के सार्वभौमिक रूप को स्पष्ट रूप से ईश्वर पर ध्यान के लिए नए लोगों को दी जाने वाली एक काल्पनिक रूप बताया गया है। जो लोग अत्यधिक भौतिकवादी हैं, वे यह समझने में पूरी तरह से असमर्थ हैं कि भगवान वास्तव में सच्चिदानंद-विग्रह हैं, या आनंद और ज्ञान का शाश्वत रूप हैं, जो भौतिक ऊर्जा के प्रदर्शन को पार करते हैं। इसलिए इस तरह के स्थूल भौतिकवादियों को वफादार आस्तिक बनने के लिए प्रोत्साहित करने , वैदिक साहित्य उन्हें भौतिक ब्रह्मांड पर सर्वोच्च भगवान के विशाल शरीर के रूप में ध्यान करने का निर्देश देता है। यह पंथवादी अवधारणा सर्वोच्च भगवान की अंतिम वास्तविकता को प्रतिबिंबित नहीं करती है, लेकिन यह धीरे-धीरे मन को ईश्वर की ओर लाने की एक तकनीक है।

श्रील श्रीधर स्वामी ने निम्नलिखित श्लोक को इस सबूत के रूप में उद्धृत किया है कि भगवान ब्रह्मा को विनाश के समय भगवान के पास वापस जाना चाहिए:

ब्रह्मणा सह ते सर्वे

सम्प्राप्‍ते प्रतिसंञ्चरे

परस्यान्‍ते कृतात्‍मानः

प्रविशंति परं पदम्

"अंतिम विनाश के समय सभी आत्म-साक्षात्कारी आत्माएं ब्रह्मा के साथ परम निवास में प्रवेश करती हैं।" चूंकि ब्रह्मा को कभी-कभी सर्वोच्च भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त माना जाता है, इसलिए उन्हें केवल अव्यक्त नामक भौतिक प्रकृति की अप्रकट अवस्था में प्रवेश करने के बजाय निश्चित रूप से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए। इस संबंध में श्रील श्रीधर स्वामी बताते हैं कि गैर-भक्तों का एक वर्ग है जो अश्वमेध यज्ञ और अन्य बलिदानों को करने से ब्रह्मा के ग्रह को प्राप्त करते हैं, और कुछ मामलों में ब्रह्मा स्वयं सर्वोच्च भगवान के भक्त नहीं हो सकते हैं। इसलिए अव्यक्तं विशते सूक्ष्म को यह इंगित करने के लिए समझा जा सकता है कि ऐसा गैर-भक्त ब्रह्मा भौतिक विशेषज्ञता की अंतिम सार्वभौमिक स्थिति हासिल करने के बावजूद, आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकता है। लेकिन जब ब्रह्मा सर्वोच्च भगवान के भक्त होते हैं तो अव्यक्त शब्द को आध्यात्मिक आकाश को इंगित करने के लिए लिया जा सकता है; चूंकि शर्तों वाली आत्माओं के लिए आध्यात्मिक आकाश प्रकट नहीं होता है, इसे अव्यक्त भी माना जा सकता है। यहां तक कि भगवान ब्रह्मा सर्वोच्च भगवान के सामने समर्पण किए बिना ईश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, तो अन्य तथाकथित पवित्र या विशेषज्ञ गैर-भक्तों के बारे में क्या कहना है।

इस संबंध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इंगित किया है कि ब्रह्मा के स्तर के भीतर तीन श्रेणियाँ होती हैं, अर्थात् कर्मी, ज्ञानी और भक्त। एक ब्रह्मा जो ब्रह्मांड का सबसे श्रेष्ठ कर्म है, उसे भौतिक दुनिया में वापस आना होगा; एक जीव जिसने ब्रह्मांड के भीतर सबसे महान सैद्धांतिक दार्शनिक होने के कारण ब्रह्मा पद प्राप्त कर लिया है, वह अवैयक्तिक मुक्ति प्राप्त कर सकता है; और एक जीव जिसे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के महान भक्त होने के कारण ब्रह्मा पद से सम्मानित किया गया है, वह भगवान के व्यक्तिगत निवास में प्रवेश करता है। श्रीमद-भागवतम (3.32.15) में एक और मामले का वर्णन किया गया है: एक ब्रह्मा जो भगवान का भक्त है, लेकिन जिसके मन में स्वयं को भगवान से स्वतंत्र या उसके समान समझने की प्रवृत्ति है, वह विनाश के समय महा-विष्णु के निवास को प्राप्त कर सकता है, लेकिन जब सृष्टि फिर से शुरू होती है तो उसे लौटना पड़ता है और फिर से ब्रह्मा का पद ग्रहण करना होता है। इस मामले में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द भेदा-दृष्ट्या है, जो स्वयं को स्वतंत्र रूप से शक्तिशाली मानने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। भगवान ब्रह्मा के रूप में ऐसे ऊंचे जीव के लिए संभव विभिन्न गंतव्य निश्चित रूप से साबित करते हैं कि कोई भी भौतिक स्थिति आनंद और ज्ञान के एक शाश्वत जीवन की गारंटी देने के लिए बेकार है। भगवद्-गीता में भगवान कृष्ण ने वादा किया है कि यदि कोई अन्य सभी तथाकथित दायित्वों को छोड़ देता है और भगवान की भक्ति सेवा में आत्मसमर्पण कर देता है, तो भगवान व्यक्तिगत रूप से उसकी रक्षा करेंगे और उसे आध्यात्मिक आकाश में सर्वोच्च निवास में वापस लाएंगे। कृष्ण के चरण कमलों के सामने समर्पण न करके अपने स्वयं के ज़ोरदार प्रयास से पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करना व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण है। इस तरह के अंधे प्रयास को भगवद्-गीता के अठारहवें अध्याय में बहुलायास के रूप में वर्णित किया गया है, जो दर्शाता है कि यह जुनून के भौतिक तरीके से काम करता है। ब्रह्मा जुनून के स्वामी हैं, और संपूर्ण ब्रह्मांड का उनका निर्माण और प्रबंधन निश्चित रूप से बहुलायास या ज़ोरदार प्रयास है, सबसे ऊंचे अर्थ में। लेकिन कृष्ण के चरण कमलों के समर्पण के बिना ऐसा सभी भावुक कार्य, यहाँ तक कि भगवान ब्रह्मा का भी, अंततः बेकार है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)